धनतेरस कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाई जाती है और इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर जी की पूजा की जाती है। यह दिन नई खरीदारी (सोना, चांदी, बर्तन) और समृद्धि के लिए बहुत शुभ माना जाता है।
धनतेरस का महत्व
1.स्वास्थ्य : इस दिन आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था। यह दिन हमें सिखाता है कि 'पहला सुख निरोगी काया' है, यानी स्वास्थ्य ही असली धन है।
2.समृद्धि : धन और वैभव के लिए लक्ष्मी जी और कुबेर देव की पूजा की जाती है। नई वस्तुएं (सोना, चांदी, बर्तन) खरीदना शुभ माना जाता है, जो घर में बरकत लाता है।
3.सुरक्षा: मृत्यु के देवता यमराज के लिए दीपदान किया जाता है, ताकि परिवार की अकाल मृत्यु और बीमारियों से रक्षा हो सके।
समुद्र मंथन से जुड़ी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन हुआ, तब अनेक दिव्य वस्तुएं और रत्न प्रकट हुए। इन्हीं में से एक थे भगवान धन्वंतरि, जो अपने हाथों में अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए।भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है, इसलिए इस दिन स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना की जाती है। इसी कारण इस तिथि को "धनतेरस" कहा गया — धन (समृद्धि) और तेरस (त्रयोदशी)।
राजा हिमा की कथा (यमदीपदान की कहानी)
धनतेरस से जुड़ी एक और प्रसिद्ध कथा है, राजा हिमा के पुत्र की। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। जब वह दिन आया, तो उसकी पत्नी ने एक उपाय किया।उसने घर के बाहर ढेर सारे दीपक जलाए और सोने-चांदी के आभूषणों का ढेर लगाकर पति को जागते रहने के लिए कहानियां सुनाती रही। जब यमराज सर्प के रूप में आए, तो दीपकों की चमक और आभूषणों की रोशनी से उनकी आंखें चकाचौंध हो गईं और वे घर के अंदर प्रवेश नहीं कर सके। वे बाहर ही बैठकर पूरी रात पत्नी की कहानियां सुनते रहे और सुबह बिना कुछ किए लौट गए।इस प्रकार राजा हिमा के पुत्र की मृत्यु टल गई। तभी से इस दिन यमदीपदान की परंपरा शुरू हुई, जिसमें लोग घर के बाहर दीप जलाकर यमराज से अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
धनतेरस पूजा विधि
धनतेरस, जो दीपावली का पहला दिन होता है, इस दिन भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इस दिन प्रातःकाल स्नान करके घर की अच्छी तरह सफाई की जाती है और पूजा स्थल को सजाया जाता है। संध्या समय शुभ मुहूर्त में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर लक्ष्मी जी और धन्वंतरि भगवान की मूर्ति या चित्र स्थापित किए जाते हैं। इसके बाद जल, रोली, अक्षत, फूल, फल और मिठाई अर्पित की जाती है तथा दीपक और धूप जलाकर श्रद्धा से पूजा की जाती है। लक्ष्मी जी की आरती करके सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है। इस दिन सोना, चांदी या बर्तन खरीदना भी शुभ माना जाता है। रात के समय घर के मुख्य द्वार पर यमराज के नाम का दीपक, जिसे यमदीप कहा जाता है, जलाया जाता है ताकि परिवार को अकाल मृत्यु से रक्षा मिले। अंत में प्रसाद बांटकर पूजा का समापन किया जाता है। इस प्रकार धनतेरस की पूजा विधि स्वच्छता, श्रद्धा, स्वास्थ्य और समृद्धि का संदेश देती है।इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है।
कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनियाँ के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी प्रथा है; जिसके सम्भव न हो पाने पर लोग चाँदी के बने बर्तन खरीदते हैं। लोग इस दिन दीपावली की रात लक्ष्मी, गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं। इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

