देव दीपावली: देवताओं की दीवाली और महा-महोत्सव
भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर उत्सव के पीछे गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक महत्व छुपा होता है। इन्हीं महापर्वों में से एक है देव दीपावली। जहाँ कार्तिक अमावस्या को मनुष्य दीप जलाकर 'दीपावली' मनाते हैं, वहीं ठीक १५ दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को देवतागण अपनी दिवाली मनाने धरती पर उतरते हैं, जिसे 'देव दीपावली' कहा जाता है।यह उत्सव विशेष रूप से भारत की सांस्कृतिक राजधानी और भगवान शिव की नगरी काशी (वाराणसी) में अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है।
देव दीपावली क्या है ?
देव दीपावली का सरल शब्दों में अर्थ है—"देवताओं की दीपावली"। हिंदू सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन स्वर्ग से सभी देवी-देवता अदृश्य रूप में वाराणसी के पवित्र घाटों पर पधारते हैं और गंगा नदी के तट पर दीप जलाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं।यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश की, अधर्म पर धर्म की और आसुरी शक्तियों पर दैवीय शक्तियों की विजय का एक विराट प्रतीक है। इस दिन पूरी काशी नगरी, विशेषकर गंगा के ८४ घाट, लाखों दीयों की रोशनी से जगमगा उठते हैं, जिसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश के सारे तारे धरती पर उतर आए हों।
यह कब मनाई जाती है ?
हिंदू पंचांग के अनुसार, देव दीपावली प्रतिवर्ष कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है।यह त्योहार मुख्य दीपावली (अमावस्या) के ठीक १५ दिन बाद आता है।अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह पर्व आमतौर पर नवंबर के महीने में पड़ता है।
महत्वपूर्ण तथ्य: कार्तिक का महीना हिंदू धर्म में सबसे पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। इस पूरे महीने में दीपदान और पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है, और इसका चरमोत्कर्ष कार्तिक पूर्णिमा यानी देव दीपावली के दिन होता है।
देव दीपावली से जुड़ी पौराणिक कथाएँ
इस महापर्व को मनाए जाने के पीछे कई अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से मुख्य कथाएँ निम्नलिखित हैं:
क) त्रिपुरासुर वध की कथा
यह देव दीपावली की सबसे प्रमुख और लोकप्रिय कथा है। प्राचीन काल में तारकासुर नाम का एक भयानक राक्षस था, जिसके तीन पुत्र थे— तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। इन्हें सामूहिक रूप से त्रिपुरासुर कहा जाता था।
- कठिन तपस्या और वरदान: इन तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। ब्रह्मा जी के प्रकट होने पर उन्होंने अमर होने का वरदान माँगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि मृत्यु तो निश्चित है, इसलिए कुछ और माँगो। तब उन्होंने चालाकी से वरदान माँगा कि उनके लिए तीन अलग-अलग नगर (पुर) बनाए जाएँ (सोने, चाँदी और लोहे के), जो अलग-अलग दिशाओं में अंतरिक्ष में तैरते रहें। वे तीनों नगर साल में केवल एक बार, कुछ ही क्षणों के लिए एक सीधी रेखा में आएँगे। और यदि कोई अत्यंत शक्तिशाली देवता एक ही बाण से उन तीनों नगरों को एक साथ नष्ट कर सके, तभी उनकी मृत्यु हो। ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कह दिया।
- राक्षसों का आतंक: वरदान पाकर त्रिपुरासुर अजेय हो गए। उन्होंने तीनों लोकों पर कब्ज़ा कर लिया और साधु-संतों तथा देवताओं को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया गया।
- भगवान शिव का रौद्र रूप: व्याकुल होकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए, और विष्णु जी की सलाह पर वे सब भगवान शिव की शरण में पहुँचे। देवताओं की रक्षा के लिए भोलेनाथ ने एक दिव्य रथ तैयार किया। इस रथ के पहिए सूर्य और चंद्रमा बने, सारथी स्वयं ब्रह्मा जी बने, और बाण के रूप में भगवान विष्णु और अग्नि देव समाहित हुए।
- त्रिपुरांतक अवतार: कार्तिक पूर्णिमा के दिन जैसे ही वे तीनों असुर नगरी (त्रिपुर) एक सीधी रेखा में आए, भगवान शिव ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची और एक ही अचूक बाण से तीनों नगरों को भस्म कर दिया और त्रिपुरासुर का अंत किया।
- देवताओं का उत्सव: त्रिपुरासुर के वध से तीनों लोकों को मुक्ति मिली। इस खुशी में सभी देवी-देवता स्वर्ग से उतरकर शिव की नगरी काशी आए और उन्होंने दीप जलाकर विजय का उत्सव मनाया। इसी कारण भगवान शिव को 'त्रिपुरांतक' या 'त्रिपुरारी' भी कहा जाता है, और इस दिन को 'देव दीपावली' के रूप में अमर कर दिया गया।
ख) भगवान विष्णु का मत्स्यावतार
एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने संसार को प्रलय से बचाने और वेदों की रक्षा करने के लिए अपना पहला अवतार— मत्स्यावतार (मछली का रूप) लिया था। इस अवतार में उन्होंने शंखासुर नामक राक्षस का वध किया था और वेदों को पुनः सुरक्षित किया था। इस पावन शुरुआत की खुशी में भी यह दिन उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
ग) कार्तिकेय जी का जन्म
कुछ पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र, देवताओं के सेनापति स्वामी कार्तिकेय का जन्म भी इसी दिन हुआ था। तारकासुर का वध करने वाले कार्तिकेय के जन्मोत्सव की खुशी में देवताओं ने दीप जलाकर आनंद व्यक्त किया था।
देव दीपावली कैसे मनाई जाती है और इस दिन क्या करते हैं?
यूँ तो देव दीपावली पूरे देश के मंदिरों और पवित्र सरोवरों पर मनाई जाती है, लेकिन इसका असली वैभव और छटा केवल वाराणसी (काशी) में ही देखने को मिलती है। इस दिन काशी का नजारा अकल्पनीय होता है।
1.पवित्र गंगा स्नान और संकल्प
इस दिन सुबह ब्रह्ममुहूर्त (भोर) से ही लाखों श्रद्धालु गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष के पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं।2.घाटों की अभूतपूर्व सजावट और दीपदान
शाम होते ही वाराणसी के सभी ८४ घाट (जैसे दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, मणिकर्णिका घाट, पंचगंगा घाट आदि) लाखों मिट्टी के दीयों (दीपक) से जगमगा उठते हैं।घाटों की सीढ़ियों पर दीयों को बेहद खूबसूरत आकृतियों (जैसे ॐ, स्वास्तिक, त्रिशूल और रंगोलियों) के रूप में सजाया जाता है। केवल घाट ही नहीं, बल्कि गंगा पार की रेत, काशी के सभी मंदिर, मकान और गलियाँ भी दीयों की रोशनी से सराबोर हो जाती हैं।3.महा आरती
देव दीपावली की शाम को होने वाली गंगा आरती सामान्य दिनों की आरती से कई गुना भव्य होती है।दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट पर मुख्य आयोजन होता है, जहाँ दर्जनों विद्वान अर्चक (पुजारी) पारंपरिक वेशभूषा में, विशाल और भारी पीतल के दीपकों से माँ गंगा की आरती उतारते हैं।ढोल-नगाड़ों, शंखनाद, घंटियों और डमरू की गूंज से पूरा माहौल अलौकिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।4.दीपदान और आकाश दीप
इस दिन नदी में जलते हुए दीयों को प्रवाहित करने (दीपदान) की परंपरा है। लोग दोने में दीपक रखकर गंगा मैया की लहरों पर छोड़ते हैं। जब लाखों दीये पानी पर तैरते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे गंगा नदी स्वयं सोने की चादर ओढ़े बह रही हो। इसके अलावा, बांस के ऊपर ऊंचे टोकनों में दीपक जलाकर आकाश में लटकाया जाता है, जिसे 'आकाशादीप' कहते हैं। यह पूर्वजों और देवताओं के मार्ग को आलोकित करने के लिए किया जाता है।5.चेत सिंह घाट पर लेज़र शो और आतिशबाज़ी
आधुनिक समय में पारंपरिक दीयों के साथ-साथ अत्याधुनिक तकनीक का भी मिश्रण देखा जाता है। काशी के ऐतिहासिक चेत सिंह घाट पर भव्य लेज़र लाइट एंड साउंड शो का आयोजन किया जाता है, जिसमें शिव महिमा और देव दीपावली के इतिहास को लाइटों के माध्यम से दिखाया जाता है। इसके बाद होने वाली ग्रीन आतिशबाज़ी देखने लायक होती है।
उत्सव के अन्य महत्वपूर्ण पहलू
देव दीपावली केवल एक धार्मिक पूजा नहीं है, इसके कई सामाजिक, सांस्कृतिक और वैश्विक पहलू भी हैं:
- सांस्कृतिक संगम और संगीत
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग और विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा संगीत और नृत्य के कई बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। देश-विदेश के जाने-माने शास्त्रीय गायक, वादक और नर्तक काशी आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।- शहीदों को नमन (बुद्ध पूर्णिमा और राष्ट्रभक्ति)
काशी के घाटों पर देव दीपावली के दिन केवल देवताओं को ही नहीं, बल्कि देश के वीर शहीदों को भी याद किया जाता है। "अमर जवान ज्योति" की अनुकृति बनाकर शहीदों को 'दीप-अंजलि' दी जाती है। पारंपरिक 'गंगा आरती' के साथ-साथ देशभक्ति के तराने गूंजते हैं, जो धार्मिक उत्सव में राष्ट्रभक्ति का अद्भुत रंग भर देते हैं।- वैश्विक आकर्षण
आज देव दीपावली एक वैश्विक उत्सव बन चुका है। दुनिया के कोने-कोने से लाखों अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक, फोटोग्राफर और वृत्तचित्र (Documentary) निर्माता इस अद्भुत दृश्य को कैमरे में कैद करने काशी आते हैं। इस दिन गंगा नदी में नावों, क्रूज़ (जैसे अलकनंदा क्रूज़) और बजड़ों की बुकिंग महीनों पहले से हो जाती है ताकि लोग बीच नदी से घाटों की सुंदरता निहार सकें।- पर्यावरण और सामाजिक समरसता
आजकल इस त्योहार पर पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी देखी जाती है। लोग केवल मिट्टी के दीयों और शुद्ध तेल/घी का उपयोग करते हैं। इस उत्सव में जाति, धर्म और वर्ग का भेद मिट जाता है। समाज के हर वर्ग के लोग— बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, और यहाँ तक कि विदेशी मेहमान भी हाथ में दीया लेकर घाटों को सजाने में मदद करते हैं।
निष्कर्ष
देव दीपावली भारतीय संस्कृति की उस महान सोच का प्रतीक है जो कहती है—"तमसो मा ज्योतिर्गमय" (अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलो)। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि चाहे बुराई (त्रिपुरासुर) कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में जीत अच्छाई, धर्म और सत्य की ही होती है।यदि जीवन में कभी भारत के आध्यात्मिक गौरव को साक्षात देखना हो, तो कार्तिक पूर्णिमा की उस शाम काशी के घाटों पर खड़े होकर देखना चाहिए, जहाँ इंसानों की श्रद्धा और देवताओं का आशीर्वाद मिलकर एक ऐसा अलौकिक दृश्य रचते हैं जो शब्दों से परे और सीधे आत्मा को छू लेने वाला होता है।

