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दत्तात्रेय जयन्ती

दत्तात्रेय जयंती हर साल हिंदू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष (अगहन) महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार दिसंबर महीने में आती है।भगवान दत्तात्रेय, महर्षि अत्रि और उनकी सहधर्मिणी अनुसूया के पुत्र थे। इनके पिता महर्षि अत्रि सप्तऋषियों में से एक है, और माता अनुसूया को सतीत्व के प्रतिमान के रूप में उदधृत किया जाता है।हमारे पुराण देवी-देवताओं की चमत्कारिक घटनाओं से भरे हुए हैं। हिन्दू धर्म में असंख्य देवों का वर्णन है, इसलिए इनसे जुड़ी घटनाओं की संख्या भी बहुत अधिक है।

दत्तात्रेय जयंती: ज्ञान, योग और वैराग्य की पवित्र कथा

इस दिन भगवान दत्तात्रेय का अवतार हुआ था, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीनों देवों का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। वे ज्ञान, योग, वैराग्य और गुरु-तत्व के प्रतीक हैं,और उनकी कथा गहन आध्यात्मिक अर्थों से भरपूर है।प्राचीन समय में महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया अत्यंत तपस्वी,धर्मनिष्ठ और पुण्यात्मा थे। अनसूया को पतिव्रता धर्म का सर्वोच्च आदर्श माना जाता था और उनकी पवित्रता की ख्याति तीनों लोकों में फैल चुकी थी। एक बार देवताओं की पत्नियों—सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती—को यह जानने की इच्छा हुई कि अनसूया का पतिव्रत कितना महान है। उन्होंने अपने-अपने पतियों से इसकी परीक्षा लेने का आग्रह किया। तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों साधु का वेश धारण करके महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे।जब अनसूया ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया, तो उन तीनों ने एक कठिन शर्त रखी कि वे तभी भोजन ग्रहण करेंगे जब अनसूया उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराएंगी। यह स्थिति अनसूया के लिए धर्म-संकट बन गई—एक ओर अतिथि सेवा का कर्तव्य था और दूसरी ओर पतिव्रता धर्म की मर्यादा। तब अनसूया ने अपने तप और पवित्रता की शक्ति से उन तीनों देवों को छोटे-छोटे शिशुओं में बदल दिया और उन्हें मातृभाव से भोजन कराया।

इस प्रकार उन्होंने अपनी मर्यादा और धर्म दोनों की रक्षा की।जब काफी समय बीत गया और तीनों देव वापस नहीं लौटे, तो उनकी पत्नियाँ चिंतित होकर अनसूया के पास पहुँचीं और उनसे क्षमा माँगी। अनसूया ने दया दिखाते हुए उन शिशुओं को पुनः उनके वास्तविक रूप में लौटा दिया। तीनों देव अनसूया की महानता से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे वरदान माँगने को कहा। अनसूया ने इच्छा प्रकट की कि वे तीनों देव उसके पुत्र के रूप में जन्म लें। देवताओं ने उसका यह वरदान स्वीकार कर लिया।कुछ समय बाद अनसूया के गर्भ से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ, जो तीनों देवों के अंशों से युक्त था। इस बालक का नाम दत्तात्रेय रखा गया—“दत्त” अर्थात् दिया हुआ और “अत्रेय” अर्थात् अत्रि का पुत्र। भगवान दत्तात्रेय बचपन से ही अत्यंत ज्ञानी, योगी और वैराग्यपूर्ण थे। उन्होंने सांसारिक मोह-माया से दूर रहकर आत्मज्ञान और तपस्या का मार्ग अपनाया।

भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है। उन्होंने संसार के 24 गुरुओं से शिक्षा ली, जिनमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, समुद्र, पक्षी, पशु आदि शामिल हैं। उन्होंने यह सिखाया कि सच्चा ज्ञान केवल ग्रंथों से नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के हर अनुभव से प्राप्त किया जा सकता है।दत्तात्रेय जयंती के दिन भक्तजन व्रत रखते हैं, भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और उनके उपदेशों का पालन करने का संकल्प लेते हैं। यह दिन विशेष रूप से गुरु-भक्ति, संयम, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।अंततः, दत्तात्रेय जयंती की यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, निष्ठा, तप और शुद्ध आचरण से भगवान को भी प्रसन्न किया जा सकता है। यह पर्व केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि ज्ञान, त्याग और आत्मबोध का संदेश देने वाला एक महान आध्यात्मिक अवसर है।

दत्ता जयंती पर, लोग सुबह-सुबह पवित्र नदियों या झरनों में स्नान करते हैं और उपवास रखते हैं। फूल, धूप, दीपक और कपूर से दत्तात्रेय की पूजा की जाती है। भक्त उनकी प्रतिमा का ध्यान करते हैं और उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेकर दत्तात्रेय से प्रार्थना करते हैं। वे दत्तात्रेय के कार्यों को याद करते हैं और भगवान के प्रवचनों से युक्त पवित्र ग्रंथ अवधूत गीता और जीवनमुक्त गीता पढ़ते हैं। अन्य पवित्र ग्रंथ जैसे कि कावड़ी बाबा द्वारा रचित दत्ता प्रबोध (1860) और परम पूज्य वासुदेवानंद सरस्वती (टेम्बे स्वामी महाराज) द्वारा रचित दत्ता महात्म्य, जो दोनों दत्तात्रेय के जीवन पर आधारित हैं, साथ ही दत्तात्रेय के अवतार माने जाने वाले नरसिम्हा सरस्वती (1378-1458) के जीवन पर आधारित गुरुचरित, भक्तों द्वारा पढ़े जाते हैं।

इस दिन भजन (भक्ति गीत) भी गाए जाते हैं।मानिक नगर स्थित मानिक प्रभु मंदिर जैसे कुछ मंदिर इस अवधि में देवता के सम्मान में वार्षिक सात दिवसीय उत्सव का आयोजन करते हैं। इस मंदिर में एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिनों तक दत्ता जयंती मनाई जाती है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना से लोग देवता के दर्शन के लिए यहां आते हैं।संत मानिक प्रभु, जिन्हें दत्ता संप्रदाय के लोग दत्तात्रेय का अवतार भी मानते हैं, का जन्म दत्ता जयंती के दिन हुआ था।

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