छठ पर्व, छठि या षष्ठी पूजा हिन्दुओं का नेपाली-भारतीय पर्व है जिसमें सूर्य की पूजा-उपासना की जाती है। यह कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के षष्ठी (सूर्य षष्ठी / दीपावली के बाद छठे दिन) को मनाया जाता है।सूर्योपासना का यह लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। दीपावली के छठे दिन से शुरू होने वाला छठ का पर्व चार दिनों तक चलता है। छठ का व्रत एक कठिन व्रत है जिसमें षष्ठी भगवती की पूजा-अर्चना करके पुत्र, पति एवं परिवार के कल्याण की कामना की जाती है।यह पर्व मैथिल,मगही और भोजपुरी लोगों का सबसे बड़ा पर्व कहा जा सकता है । छठ हिन्दुओं का ऐसा एकमात्र पर्व है जो वैदिक काल से चला आ रहा है। यह पर्व ऋग्वेद में वर्णित सूर्य पूजन एवं उषा पूजन तथा आर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता हैं।
छठ पूजा के मुख्य महत्व:
- सूर्य और छठी मैया की उपासना: इस महापर्व में प्रत्यक्ष देवता सूर्य और उनकी बहन छठी मैया की पूजा की जाती है। यह मान्यता है कि इससे संतान प्राप्ति और उनकी रक्षा का आशीर्वाद मिलता है।
- पारिवारिक सुख और आरोग्यता: यह व्रत परिवार के स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि के लिए किया जाता है।
- प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल: यह त्योहार प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान को दर्शाता है। इसमें बाँस की सूप, दउरा, फल और मिट्टी के दीयों का उपयोग होता है, जो पर्यावरण के अनुकूल हैं।
- सामाजिक समरसता: यह पर्व जाति, लिंग या आर्थिक भेद को मिटाकर, सभी को एक घाट पर लाकर सामाजिक एकता का संदेश देता है।
- वैज्ञानिक महत्व: चार दिनों का यह व्रत शरीर को शुद्ध करने, हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने और सर्दियों के मौसम के लिए तैयार करने में मदद करता है, जिससे मानसिक और शारीरिक आरोग्यता बढ़ती है।
पुराणों के अनुसार जब सृष्टि की रचना हुई, तब प्रकृति के संतुलन के लिए सूर्य देव को जीवनदाता बनाया गया। उनके प्रकाश और ऊर्जा से ही पृथ्वी पर जीवन संभव हुआ। उसी समय प्रकृति की छठी शक्ति के रूप में छठी मैया का प्राकट्य हुआ, जिन्हें संतान की रक्षा करने वाली और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली देवी माना गया।छठी मैया को प्रकृति की छठी ऊर्जा (षष्ठी) कहा गया, जो बच्चों के जीवन, स्वास्थ्य और दीर्घायु की रक्षक मानी जाती हैं। तभी से षष्ठी तिथि को उनकी पूजा का विशेष महत्व स्थापित हो गया।
1.महाभारत काल की कथा – द्रौपदी और पांडवों का उद्धार
महाभारत काल में पांडव जब जुए में अपना सब कुछ हार गए, तब उनके जीवन में अत्यंत संकट आ गया। वे वन-वन भटकने लगे और कठिनाइयों से घिर गए। उस समय द्रौपदी अत्यंत दुखी और चिंतित थीं।तब एक महर्षि ने द्रौपदी को छठ व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने पूरी श्रद्धा, नियम और कठोर तपस्या के साथ सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की। उन्होंने कई दिनों तक उपवास रखा, नदी के पवित्र जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया और पूरी निष्ठा से प्रार्थना की।उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें आशीर्वाद दिया। धीरे-धीरे पांडवों के जीवन से संकट दूर होने लगे और अंततः उन्हें उनका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया। इस कथा से यह सिद्ध होता है कि सच्ची श्रद्धा और तपस्या से असंभव भी संभव हो जाता है।
2.रामायण काल की कथा – राम और सीता द्वारा छठ व्रत
एक अन्य कथा भगवान राम और माता सीता से जुड़ी हुई है। जब रामजी 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ, तब उन्होंने राज्य की समृद्धि और जनता की खुशहाली के लिए कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठ व्रत किया।कहा जाता है कि उस दिन राम और सीता ने सरयू नदी के तट पर खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया और छठी मैया की पूजा की। उनके इस व्रत से पूरे राज्य में सुख, शांति और समृद्धि आई।
3.कर्ण की कथा – सूर्य पुत्र की भक्ति
छठ पूजा से जुड़ी एक और अत्यंत महत्वपूर्ण कथा कर्ण की है, जो सूर्य देव के पुत्र माने जाते हैं।कर्ण प्रतिदिन प्रातःकाल नदी में कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। वे सूर्य की उपासना के कारण अद्भुत शक्ति और तेज से भरपूर थे। उनकी दानशीलता और वीरता का रहस्य भी सूर्य भक्ति ही मानी जाती है।आज भी छठ पूजा में श्रद्धालु उसी परंपरा का पालन करते हैं—जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना, जिससे यह परंपरा युगों से चली आ रही है।
छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं, जिसमें सूर्य देव और छठी मैया की उपासना की जाती है। हर चरण का अपना विशेष धार्मिक, मानसिक और सामाजिक महत्व होता है।
1.नहाय-खाय (पहला दिन)
यह छठ पूजा की शुरुआत होती है और इसे शुद्धि का दिन माना जाता है।इस दिन व्रती (जो व्रत रखते हैं) प्रातःकाल किसी पवित्र नदी, तालाब या घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करते हैं। इसके बाद घर की पूरी तरह सफाई की जाती है, ताकि वातावरण शुद्ध और पवित्र रहे।भोजन भी बहुत सादा और शुद्ध बनाया जाता है—जैसे चने की दाल, कद्दू की सब्जी और अरवा चावल। यह भोजन केवल एक बार किया जाता है और इसे “पवित्र भोजन” माना जाता है।2. खरना (दूसरा दिन)
यह छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक चरण होता है।इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं—न पानी, न भोजन। शाम को सूर्यास्त के बाद पूजा की जाती है। पूजा में गुड़ की खीर (रसीया), रोटी और फल का प्रसाद बनाया जाता है।पूजा के बाद व्रती सबसे पहले यह प्रसाद ग्रहण करते हैं, और फिर इसे परिवार और आसपास के लोगों में बांटा जाता है।3. संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन)
यह छठ पूजा का सबसे भव्य और आध्यात्मिक दृश्य होता है।इस दिन पूरे परिवार के साथ व्रती नदी, तालाब या घाट पर जाते हैं। सभी लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं और बांस की टोकरी (सूप) में प्रसाद—जैसे ठेकुआ, फल, नारियल, गन्ना आदि—सजाकर ले जाते हैं।सूर्यास्त के समय व्रती जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। इस दौरान छठ गीत गाए जाते हैं और पूरा वातावरण भक्ति से भर जाता है।4. उषा अर्घ्य (चौथा दिन)
यह छठ पूजा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण है।व्रती अगली सुबह सूर्योदय से पहले फिर से घाट पर जाते हैं। जैसे ही सूर्य की पहली किरण निकलती है, वे जल में खड़े होकर उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं।इसके बाद व्रती छठी मैया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संतानों के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।अंत में व्रत का पारण (समापन) होता है, जिसमें व्रती अदरक या मीठा प्रसाद खाकर व्रत समाप्त करते हैं।
छठ पूजा का व्रत विज्ञान और आयुर्वेद का अद्भुत संगम है, जहाँ 36 घंटे का निर्जला उपवास शरीर में 'ऑटोफैगी' की प्रक्रिया को सक्रिय कर कोशिकाओं के शुद्धिकरण में मदद करता है। उगते और डूबते सूर्य को जल में खड़े होकर अर्घ्य देने से सूर्य की सुरक्षित तरंगें आंखों और त्वचा के माध्यम से पीनियल ग्रंथि को उत्तेजित करती हैं, जिससे मानसिक शांति और विटामिन-D का संचय होता है। साथ ही, नदी के जल में खड़े होने से शरीर की ऊर्जा का प्रवाह (Thermoregulation) संतुलित होता है और मौसमी फलों का सेवन बदलते मौसम में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाता है।

