हिंदू धर्म और शाक्त परंपरा (शक्ति उपासना) में दस महाविद्याओं का विशेष स्थान है। इन दस महाशक्तियों में से चौथी महाविद्या को मां भुवनेश्वरी के रूप में पूजा जाता है। मां भुवनेश्वरी ब्रह्मांड की स्वामिनी और सृष्टि की आधारशिला मानी जाती हैं। प्रत्येक वर्ष उनकी उत्पत्ति के पावन दिन को भुवनेश्वरी जयंती के रूप में बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
क्या है भुवनेश्वरी जयंती?
भुवनेश्वरी शब्द दो शब्दों के मेल से बना है —'भुवन' (अर्थात चौदह भुवन या संपूर्ण ब्रह्मांड) और 'ईश्वरी' (अर्थात स्वामिनी या रानी)। इसका सीधा अर्थ है — संपूर्ण ब्रह्मांड की स्वामिनी।
मां भुवनेश्वरी को आदि शक्ति का सौम्य और ममतामयी रूप माना जाता है। उनके स्वरूप के बारे में शास्त्रों में वर्णन है कि वे सूर्य के समान दैदीप्यमान (चमकदार) हैं, उनके तीन नेत्र हैं और उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है। उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें वे एक हाथ में वरद मुद्रा (वरदान देने वाली), दूसरे में अभय मुद्रा (भयमुक्त करने वाली), तीसरे में अंकुश और चौथे में पाश धारण किए हुए हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य: मां भुवनेश्वरी केवल संहारक नहीं, बल्कि सृष्टि का पोषण करने वाली माता हैं। इन्हें 'जगद्धात्री' (संसार को धारण करने वाली) भी कहा जाता है। भुवनेश्वरी जयंती वह पवित्र दिन है जब इस चराचर जगत के कल्याण के लिए मां का प्राकट्य हुआ था।
भुवनेश्वरी जयंती कब आती है? (तिथि और समय)
हिंदू पंचांग के अनुसार, मां भुवनेश्वरी जयंती प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है।
- मास:भाद्रपद (भादो)
- पक्ष: शुक्ल पक्ष (चांदनी रातें)
- तिथि: द्वादशी (बारहवां दिन)
यह समय अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अमूमन अगस्त या सितंबर के महीने में आता है। तांत्रिक और शाक्त संप्रदाय के लोगों के लिए यह दिन एक महापर्व की तरह होता है, क्योंकि इस दिन की गई साधना का फल कई गुना होकर मिलता है।
मां भुवनेश्वरी के प्राकट्य की पौराणिक कथाएं
मां भुवनेश्वरी के प्रकट होने के पीछे पुराणों में कई दिव्य कथाएं मिलती हैं। यहाँ दो सबसे प्रमुख कथाओं का वर्णन किया जा रहा है:
1. सृष्टि निर्माण की कथा (देवी भागवत पुराण के अनुसार) - सृष्टि के प्रारंभ में न तो सूर्य था, न चंद्रमा, न तारे और न ही पृथ्वी। चारों ओर केवल अंधकार और शून्य था। उस समय केवल एक निराकार परम तत्व (सच्चिदानंद) विद्यमान था। उस परम तत्व के मन में सृष्टि निर्माण की इच्छा जाग्रत हुई। तभी उस निराकार तत्व ने एक साकार रूप धारण किया, जिसे 'भुवनेश्वरी' कहा गया। मां भुवनेश्वरी ने ही अपने दाहिने भाग से ब्रह्मा, मध्य भाग से विष्णु और बाएं भाग से रुद्र (शिव) को प्रकट किया। इसके बाद उन्होंने इन तीनों देवों को क्रमशः सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार का कार्य सौंपा। इस प्रकार, मां भुवनेश्वरी को इस संपूर्ण ब्रह्मांड की आदि जननी और त्रिदेवों की भी माता माना जाता है।
2. ब्रह्मा, विष्णु और महेश के गर्व-हरण की कथा - एक बार ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मन में यह अहंकार आ गया कि वे ही इस संसार के सर्वेसर्वा हैं और उनके बिना ब्रह्मांड का कोई अस्तित्व नहीं है। देवताओं के इस भ्रम और अहंकार को तोड़ने के लिए मां आदि शक्ति ने उन्हें अपने लोक (मणियों के द्वीप या मणिद्वीप) में बुलाया। जब तीनों देव वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि एक अत्यंत दिव्य सिंहासन पर माँ भुवनेश्वरी विराजमान हैं। माँ के तेज के सामने त्रिदेव निष्प्रभ (चमकहीन) हो गए। जैसे ही वे माँ के करीब गए, माँ ने उन्हें अपनी माया से स्त्रियों में बदल दिया। तब तीनों देवों को अपनी भूल का अहसास हुआ और उनका अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्होंने माँ भुवनेश्वरी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और उनकी स्तुति की। प्रसन्न होकर माता ने उन्हें पुनः उनके वास्तविक रूप में लौटाया और सृष्टि के संचालन की शक्ति प्रदान की।
इस दिन क्या किया जाता है?
भुवनेश्वरी जयंती के दिन श्रद्धालु और साधक सुबह से ही विशेष पूजा-अर्चना में लीन हो जाते हैं। इस दिन मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं:
- व्रत और संकल्प - भक्त सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त होते हैं। साफ वस्त्र (संभव हो तो लाल या पीले रंग के) धारण करके व्रत का संकल्प लेते हैं।
- कलश स्थापना और चौकी सजाना - पूजा घर में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाया जाता है। उस पर मां भुवनेश्वरी की मूर्ति या चित्र (अथवा भुवनेश्वरी यंत्र) स्थापित किया जाता है। साथ ही एक जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है, जिसे सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
- पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन - मां को कुमकुम, अक्षत (चावल), लाल फूल (विशेषकर गुड़हल या गुलाब), धूप, और दीप अर्पित किए जाते हैं। मां भुवनेश्वरी को नैवेद्य में फल, मिठाई और विशेष रूप से खीर का भोग लगाया जाता है।
- मंत्र जाप और पाठ - इस दिन मां के विशेष मंत्रों का जाप स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से किया जाता है। मां भुवनेश्वरी का मूल मंत्र निम्नलिखित है:|| ऐं ह्रीं श्रीं नमः || या माता का सबसे प्रसिद्ध बीज मंत्र:|| ह्रीं || इस दिन 'भुवनेश्वरी चालीसा', 'भुवनेश्वरी कवच' और 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- हवन और आरती - पूजा के अंत में घी, कपूर, सामग्री और विशेष जड़ी-बूटियों से छोटा सा हवन किया जाता है। इसके बाद मां की आरती गाई जाती है और सभी में प्रसाद वितरित किया जाता है।
यह त्योहार कैसे मनाया जाता है?
भारत के अलग-अलग हिस्सों में भुवनेश्वरी जयंती को मनाने के विविध तरीके हैं:
- शक्तिपीठों और मंदिरों में उत्सव: इस दिन देश के प्रमुख शक्तिपीठों (जैसे कामाख्या, तारापीठ) और विशेषकर ओडिशा के भुवनेश्वर में स्थित 'मां भुवनेश्वरी मंदिर' में भव्य उत्सव मनाया जाता है। मंदिरों को फूलों और लाइटों से सजाया जाता है।
- तांत्रिक साधना: जो लोग तंत्र विद्या या महाविद्याओं की साधना करते हैं, वे इस रात को 'सिद्ध रात्रि' मानते हैं। वे गुप्त रूप से रात के समय मंत्र साधना, यज्ञ और ध्यान करते हैं ताकि आध्यात्मिक शक्तियां प्राप्त कर सकें।
- सामूहिक भंडारे: कई जगहों पर इस दिन विशाल भंडारे और कीर्तन का आयोजन किया जाता है, जहां गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है।
भुवनेश्वरी जयंती के अन्य महत्वपूर्ण पहलू
- ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां भुवनेश्वरी को सूर्य ग्रह की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। जिनकी कुंडली में सूर्य कमजोर हो, मान-सम्मान की कमी हो या सरकारी कार्यों में बाधा आ रही हो, उन्हें मां भुवनेश्वरी की पूजा अवश्य करनी चाहिए। इस दिन व्रत रखने से कुंडली के सूर्य दोष शांत होते हैं।- 'मणिद्वीप' की अवधारणा
पौराणिक ग्रंथों में जिक्र है कि मां भुवनेश्वरी 'मणिद्वीप' में निवास करती हैं। यह द्वीप इस भौतिक संसार से परे, सभी लोकों से सर्वोच्च स्थान पर स्थित है। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से मां की आराधना करता है, उसे मृत्यु के पश्चात मणिद्वीप में स्थान मिलता है, यानी वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।- जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि
मां भुवनेश्वरी का आशीर्वाद केवल आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं है। वे भौतिक सुख भी प्रदान करती हैं। 'भुवन' की स्वामिनी होने के कारण, उनकी कृपा से भक्त को भूमि, भवन (मकान), वाहन, धन और समाज में उच्च पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। उनके उपासक के जीवन में कभी दरिद्रता (गरीबी) नहीं आती।
सारांश
भुवनेश्वरी जयंती केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, शक्ति और ब्रह्मांड की उस अदृश्य ऊर्जा के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन है जो हमारा पालन-पोषण कर रही है। मां भुवनेश्वरी का सौम्य रूप हमें सिखाता है कि शक्ति का वास्तविक उपयोग विनाश में नहीं, बल्कि सृजन और प्रेम में है। इस पावन अवसर पर मां की पूजा करने से मनुष्य के भीतर के भय, संशय और नकारात्मकता का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है।

