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भैरवी जयन्ती

भैरवी जयन्ती : दस महाविद्याओं की प्रचंड शक्ति का पावन उत्सव

सनातन धर्म में शक्ति साधना का विशेष महत्व है। आदि शक्ति के नौ रूपों (नवदुर्गा) की पूजा जहां हर घर में व्यापक रूप से की जाती है, वहीं तांत्रिक और गुप्त साधनाओं में दस महाविद्याओं की उपासना का विधान है। इन दस महाविद्याओं में से पांचवीं महाविद्या हैं—माता त्रिपुर भैरवी।माता भैरवी के प्राकट्य दिवस को 'भैरवी जयन्ती' के रूप में मनाया जाता है।

भैरवी जयन्ती कब मनाई जाती है?

हिन्दू पंचांग के अनुसार, भैरवी जयन्ती हर वर्ष मार्गशीर्ष (अघन) मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है।

विशेष नोट: इसी दिन 'दत्तात्रेय जयन्ती' और 'अन्नपूर्णा जयन्ती' भी मनाई जाती है, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह पर्व आमतौर पर दिसंबर के महीने में आता है।

इस दिन ब्रह्ममुहूर्त से ही पूजा-अर्चना शुरू हो जाती है और चूंकि माता भैरवी तंत्र की देवी हैं, इसलिए इनकी साधना में निशिता काल (मध्यरात्रि का समय) को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

कौन हैं माता त्रिपुर भैरवी?

'भैरवी' शब्द का अर्थ है—भय का नाश करने वाली या जो स्वयं इतनी भयानक हैं कि उनसे भय भी डर जाए। माता का स्वरूप अत्यंत दिव्य, ओजस्वी और डरावना होने के साथ-साथ भक्तों के लिए परम कल्याणकारी है।

  • शारीरिक स्वरूप: माता भैरवी का वर्ण उदीयमान सूर्य के समान लाल है। उनकी चार भुजाएं हैं और उनके तीन नेत्र हैं।
  • अस्त्र-शस्त्र और मुद्रा: वे अपने हाथों में जपमाला, पुस्तक, और दो हाथों से 'वरद' तथा 'अभय' मुद्रा धारण करती हैं। कुछ शास्त्रों के अनुसार, उनके हाथों में खड्ग और नरमुंड भी होता है।
  • वेशभूषा: माता ने गले में मुंडमाला धारण की हुई है और उनके वस्त्र व आभूषण लाल रंग के हैं। वे सिंह (शेर) की सवारी करती हैं।

माता भैरवी को'त्रिपुर भैरवी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे तीनों लोकों (आकाश, पाथौल और धरती) में व्याप्त हैं और विनाश व पुनरुत्पादन के चक्र को नियंत्रित करती हैं। वे चेतना के उस स्तर का प्रतीक हैं जो अज्ञान और अंधकार को जलाकर भस्म कर देता है।

भैरवी जयन्ती की पौराणिक कथा

माता त्रिपुर भैरवी के प्राकट्य से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं शास्त्रों में मिलती हैं। यहाँ दो सबसे प्रमुख कथाओं का वर्णन किया गया है:

1. नारद पांचरात्र के अनुसार: सती का उग्र रूप
एक बार जब प्रजापति दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तो उन्होंने भगवान शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया। माता सती ने यज्ञ में जाने की हठ की, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें जाने से रोका और कहा कि बिना निमंत्रण के जाना अपमानजनक होगा।शिव जी के बार-बार रोकने पर माता सती अत्यंत क्रोधित हो उठीं। उनके इस भयंकर क्रोध से ब्रह्मांड कांपने लगा। उनका रंग काला और रूप डरावना हो गया। जब शिव जी भयभीत होकर वहां से जाने लगे, तो माता सती ने दस दिशाओं में अपने दस रूप प्रकट कर दिए ताकि शिव जी किसी भी दिशा में भाग न सकें।इन दस रूपों को ही'दस महाविद्या' कहा गया। इनमें से पांचवां रूप जो प्रचंड तेज, क्रोध और अग्नि के समान दैदीप्यमान था, वही माता त्रिपुर भैरवी का था। बाद में माता ने शिव जी को अपनी शक्ति का परिचय दिया और यज्ञ में प्रस्थान किया।

2. महाविद्या प्राकट्य कथा: शिव का तिलक
एक अन्य कथा के अनुसार, जब सतयुग में महाप्रलय के बाद सृष्टि का पुनर्निर्माण हो रहा था, तब शिव जी ने माता पार्वती की परीक्षा लेने के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं। उस समय चारों ओर घोर अंधकार छा गया। तब संसार को अंधकार से बचाने के लिए और शिव जी के भीतर के तेज को बाहर लाने के लिए माता पार्वती के शरीर से एक महान शक्ति प्रकट हुई, जिनका रंग सूर्य जैसा लाल और तेज अग्नि जैसा था। वे ही माता भैरवी कहलाईं। उनके प्रकट होते ही पूरा संसार प्रकाशमान हो गया।

भैरवी जयन्ती कैसे मनाई जाती है?

भैरवी जयन्ती पर सामान्य भक्त सात्विक रूप से और तांत्रिक/साधक तामसिक या गुप्त रूप से पूजा करते हैं। यहाँ आम भक्तों के लिए सरल और शास्त्रोक्त विधि दी गई है:

पूजा की तैयारी और सामग्री - इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर एक चौकी स्थापित करें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। माता भैरवी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। यदि चित्र न हो, तो माता दुर्गा की प्रतिमा के सामने भी यह पूजा की जा सकती है।

चरण-दर-चरण पूजा विधि

1.संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर माता भैरवी के सामने अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए व्रत या पूजा का संकल्प लें।
2.आह्वान और स्थापना: माता को कुमकुम, चंदन, अक्षत (चावल) और लाल रंग के फूल (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें।
3.भोग: माता भैरवी को कंदमूल, फल और मुख्य रूप से हलवा, पूरी या खीर का भोग लगाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में उन्हें उड़द की दाल के बड़े भी चढ़ाए जाते हैं।
4.दीपक: माता के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
5.मंत्र जाप: इस दिन माता के विशेष मंत्रों का लाल चंदन की माला या रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिए।
6.आरती और क्षमा प्रार्थना: पूजा के अंत में माता की आरती करें और अनजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांगें।

मंत्र जिसका जाप करना चाहिए :

ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा या ॐ त्रिपुर भैरव्यै नमः

उत्सव के अन्य महत्वपूर्ण पहलू और सामाजिक महत्व

भैरवी जयन्ती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके कई सामाजिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक पहलू भी हैं:

  • तंत्र साधना में सर्वोच्च स्थान
    अघोरियों और तांत्रिकों के लिए यह रात 'सिद्धि' प्राप्त करने की रात होती है। शक्तिपीठों (जैसे कामाख्या, तारापीठ) में इस दिन विशेष तांत्रिक अनुष्ठान किए जाते हैं। माना जाता है कि इस रात की गई साधना कभी निष्फल नहीं होती।
  • भय और शत्रुओं पर विजय
    माता भैरवी का मुख्य गुण भय का नाश करना है। जो लोग मानसिक तनाव, भूत-प्रेत के भय, या अज्ञात डर से पीड़ित होते हैं, वे इस दिन माता की विशेष पूजा करते हैं। इसके अलावा, कोर्ट-कचहरी के मामलों और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए भी यह दिन अचूक माना जाता है।
  • 'वाक सिद्धि' की प्राप्ति
    माता भैरवी को विद्या और बुद्धि की देवी भी माना जाता है। उनकी कृपा से साधक को 'वाक सिद्धि' (जो बोलो वो सच हो जाना) और उत्कृष्ट लेखन क्षमता प्राप्त होती है।
  • दान-पुण्य का महत्व
    चूंकि यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन होता है, इसलिए इस दिन गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व है। पूजा के बाद गरीबों, ब्राह्मणों या कन्याओं को भोजन कराना और लाल रंग के वस्त्र या कंबल दान करना अत्यंत शुभ फल देता है।

निष्कर्ष

माता त्रिपुर भैरवी का स्वरूप भले ही उग्र और भयानक दिखाई देता हो, लेकिन एक मां के रूप में वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत सौम्य, करुणामयी और रक्षक हैं। वे केवल उन्हीं का विनाश करती हैं जो अधर्मी हैं या जो उनके भक्तों को नुकसान पहुंचाते हैं।

भैरवी जयन्ती का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि हमारे भीतर छिपे 'भय', 'क्रोध' और 'अज्ञान' रूपी राक्षसों का नाश करके ही हम ज्ञान और प्रकाश के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। इस दिन पूर्ण श्रद्धा और शुद्ध मन से की गई पूजा जीवन के सभी कष्टों को हर लेती है।

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