भाई दूज (जिसे भाई टीका,भाई बीज, भाई फोंटा या भ्रातृ द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है ) हिंदू धर्म में विक्रम संवत हिंदू पंचांग या शालिवाहन शक पंचांग के आठवें महीने कार्तिक के शुक्ल पक्ष (उज्ज्वल पखवाड़े) के दूसरे चंद्र दिन को मनाया जाने वाला त्योहार है। यह दिवाली या तिहार और होली के त्योहारों के दौरान मनाया जाता है। इस दिन का उत्सव रक्षा बंधन के त्योहार के समान होता है ।दक्षिण भारत में, इस दिन को यम द्वितीया के रूप में मनाया जाता है । हरियाणा और उत्तर प्रदेश में, एक अनुष्ठान भी किया जाता है, जिसमें भाई की आरती के समय पूजा के लिए क्लेवा से बंधे सूखे नारियल (क्षेत्रीय भाषा में गोला) का उपयोग किया जाता है । बंगाल में , इस दिन को भाई फोटा के रूप में मनाया जाता है, जो काली पूजा के एक दिन बाद आता है।
भाई दूज के दिन बहनें अपने भाइयों का तिलक कर उनके दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं मङ्गल की कामना करती हैं। इस दिन बहनें प्रातःकाल स्नान कर व्रत का सङ्कल्प लेती हैं तथा अपने भाई को आमन्त्रित कर थाली सजाती हैं। भाई का तिलक करके कलावा बाँधती हैं तथा आरती उतारती हैं। तदुपरान्त बहन भाई को मिष्टान्न एवं भोजन ग्रहण कराती है। भाई अपनी सामर्थ्यानुसार बहन को उपहार स्वरूप कुछ वस्त्र एवं धन आदि प्रदान करता है।भाई दूज को यम द्वितीया कहे जाने का एक कारण यह भी है कि इस दिन यमराज एवं यमुना के मिलन की स्मृति में यमुना-स्नान का विशेष महत्व होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन यमुना में स्नान करने से समस्त पाप नष्ट होते हैं तथा आयु व धन की वृद्धि होती है। इस दिन तीर्थ स्नान करने से अन्त समय में यमदूत जीव को लेने नहीं आते हैं।
भाई दूज की पौराणिक कथा
इस पर्व के पीछे एक अत्यंत सुंदर और भावनात्मक पौराणिक कथा प्रचलित है, जो प्रेम, कर्तव्य और रिश्तों की गहराई को दर्शाती है।प्राचीन समय की बात है। सूर्यदेव के दो संताने थीं—पुत्र यमराज और पुत्री यमुना। यमुना अपने भाई यमराज से अत्यंत प्रेम करती थीं। बचपन में दोनों साथ खेलते, हँसते और समय बिताते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, यमराज को अपने कर्तव्यों के कारण मृत्यु लोक के कार्यों में व्यस्त रहना पड़ा। वे न्याय और धर्म के अनुसार प्राणियों के जीवन और मृत्यु का निर्णय करते थे, इसलिए उनके पास फुर्सत बहुत कम होती थी।यमुना अपने भाई से मिलने के लिए बहुत उत्सुक रहती थीं। वे बार-बार संदेश भेजतीं—“भैया, एक बार मेरे घर आ जाइए, मैं आपका स्वागत करना चाहती हूँ।” लेकिन हर बार यमराज किसी न किसी कारण से आने में असमर्थ रहते। समय बीतता गया, पर बहन का प्रेम और प्रतीक्षा कम नहीं हुई। यमुना रोज अपने भाई की राह देखतीं, उनके लिए मन ही मन प्रार्थना करतीं और उनके आने की आशा में घर को सजा कर रखतीं।
एक दिन यमराज को अपनी बहन का स्नेह और उसका बार-बार किया गया निमंत्रण याद आया। उन्हें यह एहसास हुआ कि वे अपने कर्तव्यों में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपने सबसे प्यारे रिश्ते को समय ही नहीं दे पा रहे। तब उन्होंने निश्चय किया कि आज वे अपनी बहन से मिलने अवश्य जाएंगे।जब यमराज यमुना के घर पहुंचे, तो यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। ऐसा लगा जैसे उनके जीवन की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो। उन्होंने अपने भाई का स्वागत बड़े प्रेम और आदर के साथ किया। घर को सुंदर फूलों से सजाया, दीप जलाए, और भाई के स्वागत के लिए थाली सजाई।यमुना ने अपने भाई को आसन पर बैठाया और विधि-विधान से उनका तिलक किया। उन्होंने रोली, चावल और फूलों से पूजा की, आरती उतारी और उनके लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाए। यमुना ने अपने हाथों से अपने भाई को भोजन कराया। उस समय उनके मन में केवल एक ही भावना थी—अपने भाई की खुशहाली और लंबी उम्र की कामना।यमराज अपनी बहन के इस स्नेह, श्रद्धा और समर्पण को देखकर अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने कहा—“बहन, आज तुमने मुझे इतना प्रेम और आदर दिया है कि मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे कोई वरदान मांगो।”तब यमुना ने विनम्रता से कहा—“भैया, मेरी यही इच्छा है कि आप हर वर्ष इस दिन मेरे घर अवश्य आएं। और इस दिन जो भी भाई अपनी बहन के घर जाकर तिलक करवाए और उसका आतिथ्य स्वीकार करे, उसे कभी अकाल मृत्यु का भय न हो, और उसका जीवन सुख-समृद्धि से भरा रहे।”
यमराज ने अपनी बहन की इस पवित्र इच्छा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा—“तथास्तु! आज से यह दिन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक बनेगा। जो भाई इस दिन अपनी बहन से तिलक करवाएगा और उसके घर भोजन करेगा, उसे मेरे भय से मुक्ति मिलेगी और उसकी आयु लंबी होगी।”तभी से यह दिन “भाई दूज” के रूप में मनाया जाने लगा।समय के साथ इस पर्व का महत्व और भी बढ़ता गया। इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाती हैं, उनकी आरती उतारती हैं और उनके लिए विशेष भोजन बनाती हैं। भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं।कुछ स्थानों पर यह भी माना जाता है कि इस दिन भाई-बहन यदि साथ में यमुना नदी में स्नान करें, तो उन्हें विशेष पुण्य प्राप्त होता है और उनके रिश्ते में सदा प्रेम बना रहता है।
भाई दूज का त्योहार केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अनेक गहरे जीवन-मूल्यों का प्रतीक है। इसकी कथा में यमराज और यमुना के संबंध के माध्यम से निःस्वार्थ प्रेम, धैर्य और स्नेह का सुंदर उदाहरण मिलता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चे रिश्तों में कोई स्वार्थ नहीं होता, बल्कि केवल देने और समझने की भावना होती है। साथ ही, यह हमें याद दिलाता है कि चाहे जीवन कितना भी व्यस्त क्यों न हो, हमें अपने परिवार और प्रियजनों के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए, क्योंकि रिश्ते ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। भाई दूज में बहन द्वारा तिलक करना और भाई के लिए प्रार्थना करना सम्मान, आभार और शुभकामनाओं की शक्ति को दर्शाता है, वहीं भाई का अपनी बहन की रक्षा और साथ निभाने का वचन जिम्मेदारी और कर्तव्य का प्रतीक है।
इसके अलावा, यह त्योहार हमें क्षमा, सहनशीलता और आपसी समझदारी का महत्व भी सिखाता है, क्योंकि मजबूत रिश्ते वही होते हैं जिनमें छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज कर प्रेम बनाए रखा जाता है। अंततः, भाई दूज हमारी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखते हुए हमें यह सिखाता है कि जीवन की सच्ची खुशी प्रेम, विश्वास और मजबूत रिश्तों में ही निहित है।इस अवसर को और भी खास बनाने के लिए, भाई बीज के उपहार बहनों द्वारा भाइयों को प्रेम और प्रशंसा के प्रतीक के रूप में दिए जाते हैं।

