महाविद्या माँ बगलामुखी जयन्ती :
दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या माँ बगलामुखी को शक्ति, विजय और शत्रुओं के स्तम्भन (शांत या निष्क्रिय करने) की देवी माना जाता है। तंत्र साधना और शाक्त परम्परा में माँ बगलामुखी का स्थान अत्यंत उच्च और चमत्कारी माना गया है। हर वर्ष उनकी उत्पत्ति के उत्सव को बगलामुखी जयन्ती के रूप में बेहद श्रद्धा, पवित्रता और नियमों के साथ मनाया जाता है।
माँ बगलामुखी कौन हैं ?
माँ बगलामुखी का नाम संस्कृत के 'वल्गा' शब्द से अपभ्रंश होकर बना है, जिसका अर्थ होता है 'दुल्हन' या 'लगाम'। माँ को 'पीताम्बरा' भी कहा जाता है क्योंकि उन्हें पीला रंग अत्यधिक प्रिय है। उनका वस्त्र, आभूषण, सिंहासन और यहाँ तक कि उनकी आभा भी सुनहरी पीली है। माँ बगलामुखी के पास वह अचूक शक्ति है जो ब्रह्मांड की किसी भी गति को रोक सकती है। वे शत्रु की जीभ को कीलित (स्तम्भित) कर देती हैं, बुद्धि का हरण कर लेती हैं और साधक को वाद-विवाद, मुकदमों और संकटों में पूर्ण विजय दिलाती हैं।
बगलामुखी जयन्ती कब आती है?
हिन्दू पंचांग के अनुसार, माँ बगलामुखी की जयन्ती हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इसी दिन माँ का प्राकट्य सतयुग में हुआ था। यह दिन तंत्र साधकों और सामान्य भक्तों, दोनों के लिए सिद्धियों को जाग्रत करने की सबसे बड़ी रात्रियों में से एक माना जाता है।
यह जयन्ती क्यों मनाई जाती है?
बगलामुखी पुराण और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, सतयुग में एक बार पूरी सृष्टि पर बहुत बड़ा विनाशकारी संकट आ गया था। उस समय अचानक एक भयानक सौर तूफान और जल प्रलय उठा। इस चक्रवात की गति और शक्ति इतनी तीव्र थी कि चराचर जगत नष्ट होने लगा। पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग—तीनों लोकों का संतुलन बिगड़ने लगा और संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ गया।
सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु इस संकट से बेहद चिंतित हो उठे क्योंकि संसार की रक्षा का उत्तरदायित्व उन पर था। जब इस भयानक तूफान को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा, तब भगवान विष्णु ने आदि शक्ति की शरण लेने का निश्चय किया। वे सौरमंडल के केंद्र में स्थित 'हरिद्रा सरोवर' (हल्दी के सरोवर) के तट पर गए और वहाँ बैठकर त्रिलोक रक्षक मंत्रों के साथ आदि शक्ति महामाया की अत्यंत कठोर तपस्या शुरू की।
भगवान विष्णु की कई वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर वैशाख शुक्ल नवमी के दिन मध्यरात्रि के समय देवी साक्षात प्रकट हुईं। वे हरिद्रा सरोवर के जल से एक दिव्य पीले तेज के रूप में बाहर आईं। माता के इस स्वरूप ने अपनी अद्भुत 'स्तम्भन शक्ति' का प्रयोग करके उस विनाशकारी ब्रह्मांडीय तूफान को क्षण भर में वहीं रोक दिया और ब्रह्मांड को नष्ट होने से बचा लिया। चूंकि वे पीले रंग के सरोवर से प्रकट हुईं और उन्हें पीला रंग प्रिय था, इसलिए वे 'पीताम्बरा' कहलाईं और संसार के कष्टों को कीलित करने के कारण उन्हें 'बगलामुखी' कहा गया। इसी उपकार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हर साल यह जयन्ती मनाई जाती है।
बगलामुखी जयन्ती का महत्व और विशेषताएँ
धार्मिक और तांत्रिक दोनों दृष्टिकोण से इस दिन का महत्व अद्वितीय है। यदि कोई अज्ञात शत्रु, अदालती मुकदमा (Court Case), या कोई प्रतियोगी आपको लगातार परेशान कर रहा हो, तो इस दिन की गई पूजा एक अभेद्य कवच की तरह काम करती है। राजनीति, न्याय प्रणाली, और प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े लोग माँ की विशेष आराधना करते हैं ताकि उनके विरोधी परास्त हो सकें। इस दिन पूरी प्रकृति और पूजा स्थल को पीले रंग में सराबोर कर दिया जाता है, जिसे 'पीत अनुष्ठान' भी कहते हैं।
विस्तृत पूजन विधि और नियम
माँ बगलामुखी की पूजा में शुद्धता और नियमों का पालन करना अनिवार्य है। जरा सी चूक विपरीत प्रभाव दे सकती है, इसलिए सामान्य भक्तों को केवल सात्विक पूजा ही करनी चाहिए।
पूजा की आवश्यक सामग्री:
इस पूजा में मुख्य रूप से पीली सामग्रियों का ही उपयोग होता है, जैसे पीला कपड़ा (आसन के लिए), पीला फल (केला या आम), पीली मिठाई (बेसन के लड्डू या पेड़े), पीली सरसों, हल्दी की गांठें, चने की दाल, पीले फूल (गेंदा या कनेर), और हल्दी की माला (मंत्र जाप के लिए)।
पूजा के मुख्य चरण:
- आत्म-शुद्धि और व्रत संकल्प: जयन्ती के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पीला फूल लेकर माँ बगलामुखी के सामने व्रत और अपनी मनोकामना पूर्ति का संकल्प लें।
- चौकी स्थापना: इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर माँ बगलामुखी का चित्र या सिद्ध 'बगलामुखी यंत्र' स्थापित करें। माँ की प्रतिमा के सामने अक्षत की ढेरी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें।
- मुख्य अर्पण और पीत पूजन: माँ को हल्दी का तिलक लगाएं। पीले चावल, पीले फूल, हल्दी की गाठें और चने की दाल अर्पित करें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं (संभव हो तो दीपक में भी थोड़ी हल्दी या पीली सरसों डालें)। इसके बाद बेसन के लड्डू या केसर युक्त खीर का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप (हल्दी की माला से): माँ बगलामुखी के सिद्ध मंत्र का जाप केवल हल्दी की माला से ही करें। मंत्र पढ़ते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
- मूल मंत्र : `ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिव्हाम कीलय बुद्धिं विनाशाय ह्रीं ॐ स्वाहा।`
- समापन और आरती: जाप पूरा होने के बाद माँ की कपूर से आरती करें। पूजा में हुई किसी भी अनजानी भूल के लिए माँ से हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें और पूरे दिन फलाहार रहकर व्रत का पालन करें।
इस दिन क्या करें और क्या न करें?
चूंकि माँ बगलामुखी उग्र देवियों (महाविद्याओं) में गिनी जाती हैं, इसलिए उनके उत्सव पर अपने आचरण का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
क्या करना चाहिए:
पूजा के दौरान केवल पीले रंग के आसन और वस्त्रों का ही प्रयोग करें। साधना के समय पूरी तरह से मानसिक और शारीरिक ब्रह्मचर्य का पालन करें। यदि माता का मूल मंत्र कठिन या लंबा लगे, तो किसी बड़ी गलती से बचने के लिए केवल 'बगलामुखी चालीसा' या 'बगलामुखी अष्टोत्तर शतनामावली' का पाठ करें। इसके अलावा, यथासंभव गुप्त रहकर अपनी साधना और पूजा करें, क्योंकि तांत्रिक पूजाएँ गुप्त रखने पर ही फलित होती हैं।क्या नहीं करना चाहिए:
किसी का अकारण बुरा करने, किसी से बदला लेने या किसी को नुकसान पहुँचाने के गलत उद्देश्य से माँ की पूजा कभी न करें, ऐसा करने पर भारी नुकसान हो सकता है। पूजा के दौरान काले, नीले या गहरे रंग के कपड़ों से बिल्कुल दूर रहें। इस दिन तामसिक भोजन, मांस, मदिरा या लहसुन-प्याज का सेवन भूलकर भी न करें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन या निर्देश के कभी भी उग्र या तांत्रिक अनुष्ठान (जैसे मारण, मोहन या उच्चाटन) करने का प्रयास न करें।
पर्व के अन्य सामाजिक व सांस्कृतिक पहलू
आज के आधुनिक युग में बगलामुखी जयन्ती केवल संन्यासियों या अघोरियों तक सीमित नहीं है। भारत के प्रमुख सिद्धपीठों जैसे—दतिया (मध्य प्रदेश), नलखेड़ा (मध्य प्रदेश), और कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में इस दिन विशाल उत्सव, भंडारे और महायज्ञों का आयोजन होता है।
राजनीतिज्ञ, व्यवसायी और आम लोग जीवन के बड़े संकटों और कानूनी विवादों से उबरने के लिए सामूहिक रूप से हवन करवाते हैं। इस दिन जरूरतमंदों को चने की दाल, पीले वस्त्र, हल्दी और फलों का दान करना समाज में समृद्धि लाने और दरिद्रता का निवारण करने का प्रतीक माना जाता है।

