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शरद नवरात्रि

शारद नवरात्रि 2027:

शरद नवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है, जो माँ दुर्गा की उपासना के लिए समर्पित 9 दिनों का उत्सव है। शारदीय नवरात्रि हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नवमी तक मनाई जाती है। वर्ष 2027 में यह पावन पर्व 30 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा।

यह त्योहार देवी दुर्गा और राक्षस महिषासुर के बीच हुए उस ऐतिहासिक युद्ध से जुड़ा है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। ये 9 दिन पूरी तरह से देवी दुर्गा और उनके 9 अवतारों—नवदुर्गा को समर्पित हैं।

2027 का विशेष ज्योतिषीय एवं ग्रह-नक्षत्र प्रभाव

वर्ष 2027 की नवरात्रि बेहद खास और ऊर्जावान रहने वाली है। इस साल आश्विन मास के दौरान गुरु (बृहस्पति) और शुक्र की शुभ स्थिति भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक समृद्धि देने वाली होगी। नवरात्रि के शुरुआती दिनों में हस्त और चित्रा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो घटस्थापना और साधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। ग्रहों का यह गोचर आंतरिक शुद्धि और मानसिक शांति के लिए अत्यंत अनुकूल है।

नवदुर्गा स्वरूप, मंत्र और 2027 की तिथियाँ

प्रथम दिन – शैलपुत्री (30 सितंबर 2027, गुरुवार)

प्रतिपदा तिथि को देवी पार्वती के प्रथम अवतार शैलपुत्री ("पर्वत की पुत्री") की पूजा की जाती है। उन्हें नंदी बैल पर सवार दिखाया जाता है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल होता है।

  • तिथि एवं नक्षत्र: प्रतिपदा (अमावस्या का अंत और प्रतिपदा का प्रारंभ), हस्त नक्षत्र।
  • 2027 का रंग: पीला (क्रियाशीलता और शक्ति का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ||

दूसरा दिन – ब्रह्मचारिणी (1 अक्टूबर 2027, शुक्रवार)

द्वितीय तिथि को देवी के अविवाहित और तपस्वी स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। वे नंगे पैर चलती हैं और हाथों में रुद्राक्षमाला व कमंडल धारण करती हैं।

  • तिथि एवं पर्व: द्वितीया, चन्द्र दर्शन।
  • 2027 का रंग: हरा (प्रकृति और विकास का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

तीसरा दिन – चंद्रघंटा (2 अक्टूबर 2027, शनिवार)

तृतीय तिथि को माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। भगवान शिव से विवाह के बाद उन्होंने अपने माथे पर अर्धचंद्र धारण किया था। वह सौंदर्य और वीरता की प्रतीक हैं।

  • तिथि एवं पर्व: तृतीया, सिन्दूर तृतीया।
  • 2027 का रंग: स्लेटी (ग्रे - जीवंतता का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः।
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता॥

चौथा दिन – कुष्मांडा (3 अक्टूबर 2027, रविवार)

चतुर्थी तिथि को ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति माँ कुष्मांडा की पूजा की जाती है। उन्हें आठ भुजाओं वाली और बाघ पर विराजमान चित्रित किया गया है।

  • तिथि एवं पर्व: चतुर्थी, कपर्दिश चतुर्थी।
  • 2027 का रंग: नारंगी (प्रबल ऊर्जा का प्रवाह)।

मंत्र:

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः।
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु ॥

पांचवा दिन – स्कंदमाता (4 अक्टूबर 2027, सोमवार)

पंचमी तिथि को भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता स्वरूप माँ स्कंदमाता की पूजा होती है। वे सिंह पर सवार हैं और अपने शिशु को गोद में लिए हुए हैं।

  • तिथि एवं पर्व: पञ्चमी, उपांग ललिता व्रत।
  • 2027 का रंग: सफ़ेद (शांति और पवित्रता का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी स्कंदमातायै नमः।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥

छठा दिन – कात्यायनी (5 अक्टूबर 2027, मंगलवार)

षष्ठी तिथि को ऋषि कात्यायन की पुत्री माँ कात्यायनी की पूजा होती है, जिन्होंने महिषासुर का वध किया था। पूर्वी भारत में इस दिन महाषष्ठी के साथ दुर्गा पूजा का विशेष आरंभ होता है।

  • तिथि: षष्ठी।
  • 2027 का रंग: लाल (साहस और उग्रता का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

सातवाँ दिन – कालरात्रि (6 अक्टूबर 2027, बुधवार)

सप्तमी तिथि को माँ के सबसे उग्र स्वरूप कालरात्रि की पूजा की जाती है। असुर शुंभ-निशुंभ का वध करने के लिए उन्होंने यह रूप धरा था।

  • तिथि एवं पर्व: सप्तमी, सरस्वती आवाहन।
  • 2027 का रंग: गहरा नीला (राजसी आभा और शक्ति का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

आठवां दिन – महागौरी (7 अक्टूबर 2027, गुरुवार)

अष्टमी तिथि को अत्यंत गौर और शांत स्वरूप माँ महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन कुमारी पूजन का विशेष महत्व होता है।

  • तिथि एवं पर्व: अष्टमी, सरस्वती पूजा, दुर्गा अष्टमी।
  • 2027 का रंग: गुलाबी (आशा और सकारात्मकता का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी महागौर्यै नमः।
श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रмоददा॥

नौवां दिन – सिद्धिदात्री एवं महानवमी (8 अक्टूबर 2027, शुक्रवार)

इस दिन परिपूर्णता की देवी माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है, जो अष्ट सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। इसी दिन संधि पूजा का विशेष योग बन रहा है।

  • तिथि एवं पर्व: अष्टमी/नवमी, सन्धि पूजा, महा नवमी।
    2027 का विशेष मुहूर्त (सन्धि पूजा):
  • प्रारंभ: 7 अक्टूबर 2027 को 30:03+ बजे (यानी 8 अक्टूबर की अलसुबह 06:03 बजे)
  • समाप्त: 8 अक्टूबर 2027 को सुबह 06:51 बजे
  • 2027 का रंग: बैंगनी (भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक)।

मंत्र:

ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

विजयदशमी और विसर्जन (10 अक्टूबर तक का घटनाक्रम)

  • 10वां दिन (9 अक्टूबर 2027, शनिवार): इस दिन नवमी तिथि का समापन, आयुध पूजा, नवमी हवन और नवरात्रि पारण किया जाएगा। इसी दिन से विजयादशमी (दशहरा) का उत्सव भी शुरू होगा, जो भगवान राम द्वारा रावण वध और माता दुर्गा द्वारा महिषासुर मर्दन की खुशी में मनाया जाता है।
  • 11वां दिन (10 अक्टूबर 2027, रविवार): दशमी तिथि को दुर्गा विसर्जन किया जाएगा, जिसके साथ 9 दिनों के इस महापर्व का श्रद्धापूर्वक समापन होगा।

माँ दुर्गा की आराधना का विधिपूर्ण वर्णन

नवरात्रि शुरू होने से पहले घर की अच्छी तरह सफाई करके पूजा स्थान पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धि की जाती है। पहले दिन शुभ मुहूर्त में घटस्थापना (कलश स्थापना) की जाती है, जिसमें मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और उसके ऊपर जल से भरा कलश रखकर नारियल व आम के पत्तों से सजाया जाता है। इसके बाद माता दुर्गा का आह्वान करके अखंड ज्योति जलाई जाती है, जो पूरे 9 दिनों तक जलती रहती है।

भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखते हैं और केवल सात्विक भोजन/फलाहार ग्रहण करते हैं। प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र जाप और आरती की जाती है। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन कर उन्हें भोजन कराया जाता है और अंत में हवन व विसर्जन के साथ पूजा संपन्न होती है।

शारदीय नवरात्रि का वैज्ञानिक महत्व

यह पर्व ऋतु परिवर्तन (वर्षा से शरद ऋतु) के संधिकाल में आता है। इस समय वातावरण में बैक्टीरिया और बीमारियाँ बढ़ने की संभावना होती है। ऐसे में उपवास (व्रत) रखने और सात्विक भोजन करने से हमारा पाचन तंत्र सुधरता है, शरीर की आंतरिक शुद्धि (Detoxification) होती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है। 9 दिनों तक चलने वाले मंत्र-जाप और ध्यान से मानसिक तनाव कम होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। संक्षेप में, यह पर्व शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करने का एक वैज्ञानिक माध्यम है।

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