Online Puja & Pandit Booking
+91 91115 12346

अषाढ़ी एकादशी

आषाढ़ी एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पवित्र दिन है। यह आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाई जाती है।

आषाढ़ी एकादशी का इतिहास

प्राचीन काल में देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध हुआ था। कुम्भा नामक राक्षस के पुत्र मृदुमान्य ने तपस्या करके भगवान शंकर से वरदान के रूप में अमरत्व प्राप्त किया। इसलिए, भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव आदि भी उसे पराजित नहीं कर सके। उससे भयभीत होकर देवता त्रिकुट पर्वत पर, आंवला (एम्ब्लिका ऑफिसिनैलिस) के वृक्ष के नीचे एक गुफा में छिप गए। भोजन न होने के कारण उन्होंने आषाढ़ी एकादशी के दिन उपवास रखा। उन्होंने वर्षा में स्नान किया। तभी अचानक उनकी श्वास से ऊर्जा उत्पन्न हुई जिसने गुफा के प्रवेश द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे राक्षस मृदुमान्य का वध कर दिया। यही ऊर्जा एकादशी की देवी है।

हिंदू धर्म में इस तिथि का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि इसी दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है, जिसमें विवाह, मांगलिक कार्य और शुभ संस्कारों को रोक दिया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस समय सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु विश्राम करते हैं।प्राचीन काल में एक महान और धर्मात्मा राजा हुए जिनका नाम मान्धाता था। वे सत्यवादी, प्रजावत्सल और अत्यंत न्यायप्रिय शासक थे। उनके राज्य में चारों ओर सुख-शांति और समृद्धि थी। प्रजा अपने राजा से अत्यंत प्रसन्न थी और सभी लोग धर्म का पालन करते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया जब राज्य में भयंकर सूखा पड़ गया। कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, नदियाँ सूखने लगीं, खेत बंजर हो गए और लोगों के सामने भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई। पशु-पक्षी भी पानी और भोजन के अभाव में मरने लगे। पूरा राज्य संकट में डूब गया।राजा मान्धाता इस विपत्ति से बहुत दुखी हुए। उन्होंने सोचा कि अवश्य ही राज्य में कोई ऐसा पाप या अधर्म हुआ है जिसके कारण देवता रुष्ट हो गए हैं। वे अपने मंत्रियों और ब्राह्मणों के साथ वन में गए और वहाँ महान तपस्वी ऋषियों से इस संकट का कारण पूछा। तब एक महान ऋषि (कई कथाओं में अंगिरा ऋषि का नाम आता है) ने उन्हें बताया कि इस सूखे का कारण धर्म का सूक्ष्म ह्रास है, और इसका निवारण केवल आषाढ़ी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत और भगवान विष्णु की भक्ति से ही संभव है।ऋषि के वचनों को सुनकर राजा मान्धाता ने अपने राज्य लौटकर पूरी प्रजा को इस व्रत के महत्व के बारे में बताया। आषाढ़ी एकादशी के दिन राजा और उनकी प्रजा ने मिलकर उपवास रखा, भजन-कीर्तन किया और पूरी श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की। सभी लोगों ने अपने पापों के लिए क्षमा माँगी और सच्चे मन से भगवान का स्मरण किया।राजा और प्रजा की सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। शीघ्र ही आकाश में बादल छा गए और जोरदार वर्षा होने लगी। नदियाँ फिर से भर गईं, खेतों में हरियाली लौट आई और राज्य में सुख-समृद्धि पुनः स्थापित हो गई। इस प्रकार आषाढ़ी एकादशी के व्रत के प्रभाव से एक बड़े संकट का अंत हुआ।

आषाढ़ी एकादशी का एक और अत्यंत प्रसिद्ध महत्व  महाराष्ट्र के पंढरपुर में देखने को मिलता है, जहाँ भगवान विट्ठल (जो भगवान विष्णु का ही अवतार माने जाते हैं) की विशेष पूजा होती है। इस दिन लाखों श्रद्धालु “वारी” नामक यात्रा करते हुए पंढरपुर पहुँचते हैं। यह यात्रा कई दिनों तक पैदल चलकर की जाती है और इसमें भक्त भजन-कीर्तन करते हुए भगवान के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। संत परंपरा के महान संत जैसे संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालकियाँ भी इस यात्रा का हिस्सा होती हैं।इस दिन व्रत रखने वाले भक्त प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं, दिन भर उपवास रखते हैं और रात में जागरण कर भगवान का भजन करते हैं। अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।आषाढ़ी एकादशी हमें यह सिखाती है कि जब मनुष्य सच्चे हृदय से भगवान की भक्ति करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है, तो उसकी सभी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। यह पर्व श्रद्धा, संयम, तप और भक्ति का प्रतीक है,जो हमें अपने जीवन को सदाचार और ईश्वर भक्ति से भरने की प्रेरणा देता है।

व्रत विधि-दशमी से एक दिन पहले,केवल एक बार भोजन करके उपवास रखें। एकादशी के दिन सुबह जल्दी स्नान करें और तुलसी के पत्ते चढ़ाकर भगवान विष्णु की पूजा करें। दिनभर उपवास रखें। रात भर जागकर भगवान हरि के भक्ति गीत गाएं। अगले दिन,यानी आषाढ़ शुक्ल द्वादशी को वामन विष्णु की पूजा करें और भोजन करें।दोनों दिन,भगवान विष्णु की श्रीधर के रूप में पूजा करें और चौबीसों घंटे घी का दीपक जलाए रखें।

आषाढ़ी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व  शुद्धि, संकल्प और समर्पण के संगम में निहित है। वैज्ञानिक रूप से भी इस समय उपवास रखने से शरीर विषमुक्त (Detoxify) होता है और वर्षा ऋतु के दौरान पाचन तंत्र को आराम मिलता है। संक्षेप में, आषाढ़ी एकादशी मनुष्य को आत्म-संयम, मानसिक शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर करने वाला एक पावन अवसर है।

For Customer
Login Register
Join as Partner

Become Pandit, Agent or Associate
Click below button to register or login

Join as Partner

For any query call us:

+91 9111512346
Your Cart

Your cart is currently empty.
Let us help you find the perfect item!