अपरा एकादशी 2027:
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है, और ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'अपरा एकादशी' कहा जाता है। 'अपरा' शब्द का अर्थ है 'अपार', जिसका अर्थ है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति को अपार पुण्य, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसे कई स्थानों पर 'अचला एकादशी' के नाम से भी जाना जाता है।
वर्ष 2027 अपरा एकादशी: मुख्य तिथियाँ, शुभ मुहूर्त एवं विशेष ज्योतिषीय योग
वर्ष 2027 में अपरा एकादशी पर ग्रहों और नक्षत्रों का विशेष प्रभाव रहेगा, जो इस व्रत की महिमा को और अधिक बढ़ा रहा है। इस वर्ष से जुड़ी समस्त पंचांग गणनाएँ इस प्रकार हैं:
- अपरा एकादशी की मुख्य तिथि: यह पावन व्रत मंगलवार, जून 1, 2027 को रखा जाएगा।
- एकादशी तिथि का प्रारम्भ: मई 31, 2027 को सुबह 10:02 ए एम बजे से।
- एकादशी तिथि की समाप्ति: जून 01, 2027 को सुबह 09:39 ए एम बजे तक।
- व्रत पारण (व्रत तोड़ने का) समय: बुधवार, जून 2, 2027 को सुबह 05:24 ए एम से 08:10 ए एम के बीच।
- पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय: जून 2 को सुबह 08:28 ए एम बजे तक।
2027 का विशेष ग्रह-नक्षत्र संयोग:
वर्ष 2027 में अपरा एकादशी मंगलवार के दिन पड़ रही है। इस दिन रेवती नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो कि 27 नक्षत्रों में अंतिम और अत्यंत शुभ नक्षत्र माना जाता है, जिसके स्वामी धन और समृद्धि के देव पूषा हैं। इस दिन चंद्रमा अपनी प्रिय मीन राशि में संचरण करेंगे।
सबसे विशेष संयोग यह है कि देवगुरु बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क (Cancer) में गोचर कर रहे होंगे और सूर्य देव अपने मित्र ग्रह शुक्र की राशि वृषभ में बुद्धिमत्ता के दाता बुध के साथ युति बनाकर बुधादित्य योग का निर्माण करेंगे। मंगलवार को एकादशी और मीन राशि के चंद्रमा का यह अद्भुत योग मानसिक तनाव, कर्ज और शत्रुओं से मुक्ति पाने के लिए अत्यंत अचूक और मंगलकारी माना गया है।
अपरा एकादशी का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत करने से जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
- पापों से मुक्ति: यह व्रत विशेष रूप से परनिंदा (दूसरों की बुराई करना), झूठ बोलना, अदालत में झूठी गवाही देना और जाने-अनजाने हुए बड़े से बड़े गंभीर दोषों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है।
- पुण्य की प्राप्ति: शास्त्रों में कहा गया है कि ज्येष्ठ मास की इस एकादशी का फल कार्तिक मास में पुष्कर स्नान या गंगा तट पर किए गए पिंडदान और पितृ-तर्पण के समान ही उत्तम होता है।
- सुख-समृद्धि: जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा और सात्विकता के साथ यह व्रत रखता है, उसे जीवन में मान-सम्मान, यश, कीर्ति और आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
पौराणिक व्रत कथा
पद्म पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में महीध्वज नाम का एक परम प्रतापी और धर्मात्मा राजा था। उनका छोटा भाई वज्रध्वज बहुत क्रूर, अधर्मी और अन्यायी था। वज्रध्वज ने अपने बड़े भाई से ईर्ष्या और सत्ता के लालच के कारण रात के अंधेरे में उनकी निर्मम हत्या कर दी और उनके शव को जंगल में एक पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया।
अकाल और हिंसक मृत्यु के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगी और वहां से गुजरने वाले राहगीरों को परेशान करने लगी। एक दिन प्रसिद्ध धौम्य ऋषि वहां से गुजरे और उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से राजा की सारी व्यथा और उसके प्रेत योनि में होने का मुख्य कारण जान लिया।
ऋषि ने दयावश राजा की आत्मा को इस कष्टदायी प्रेत योनि से मुक्त कराने का दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने स्वयं ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी का कठोर व्रत किया और द्वादशी के दिन अपने व्रत का पूरा पुण्य फल उस राजा की आत्मा को अर्पित कर दिया। इस व्रत के पुण्य के प्रभाव से राजा प्रेत योनि के सभी कष्टों से तुरंत मुक्त हो गया और एक दिव्य देह धारण कर भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम चला गया। तभी से इस व्रत की महिमा चराचर जगत में फैल गई।
व्रत एवं पूजा विधि
अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु के 'त्रिविक्रम' स्वरूप (वामन अवतार का विशाल स्वरूप) की पूजा की जाती है:
- ब्रह्म मुहूर्त स्नान: 1 जून 2027 की सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी में या घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- संकल्प: स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल, अक्षत और पीले फूल लेकर व्रत का सच्चा संकल्प लें।
- पूजन सामग्री: भगवान को पीले पुष्प, पीला चंदन, धूप-दीप, ऋतु फल और विशेष रूप से तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) अर्पित करें। (याद रखें, नारायण की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है)।
- मंत्र जाप: दिन भर अपने मन में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' महामंत्र का मानसिक जाप करते रहें।
- व्रत कथा: दोपहर या संध्या काल में पूजा के समय अपरा एकादशी की इस पावन कथा का पाठ करें या श्रद्धापूर्वक श्रवण करें।
- पारण: एकादशी के अगले दिन यानी 2 जून को शुभ मुहूर्त (05:24 AM से 08:10 AM) में योग्य ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देने के बाद ही अपना व्रत खोलें।
नियम: क्या करें और क्या न करें
शास्त्रों के अनुसार इस दिन कुछ कड़े नियमों का पालन करना अत्यंत अनिवार्य माना गया है:
क्या करें:
- पूरी तरह सात्विक व्यवहार रखें। यदि फलाहार कर रहे हैं तो कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, फल और दूध का सेवन करें।
- भूमि पर शयन करें और अपना अधिक से अधिक समय ईश्वर भक्ति व कीर्ति में बिताएं।
क्या न करें (वर्जित):
- चावल का सेवन: एकादशी तिथि पर घर में चावल बनाना और उसका सेवन करना पूरी तरह वर्जित है।
- तामसिक भोजन: लहसुन, प्याज, मसूर की दाल, मांस और मदिरा का भूलकर भी सेवन न करें।
- दुर्व्यवहार: इस दिन किसी की पीठ पीछे निंदा न करें, अपशब्द न कहें, झूठ न बोलें और क्रोध करने से बचें।
ज्येष्ठ मास में दान का विशेष महत्व
चूंकि यह एकादशी जून के महीने की भीषण गर्मी के समय आती है, इसलिए इस दिन किए गए 'जलादि दान' का विशेष और अक्षय फल मिलता है:
- प्यासे मनुष्यों और राहगीरों के लिए जल से भरे कलश या मटके का दान करना।
- तीव्र धूप से बचने के लिए छाता, खड़ाऊ (जूता) या ठंडे सूती वस्त्रों का दान।
- मौसमी पीले फल (जैसे आम, खरबूजा) और सात्विक अनाज का दान।
निष्कर्ष
अपरा एकादशी का व्रत केवल एक उपवास नहीं, बल्कि मानसिक शांति और आत्मिक शुद्धि का महामार्ग है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति, सेवा और पश्चाताप के माध्यम से हम अपने जीवन के बड़े से बड़े विकारों और प्रारब्ध के दोषों को दूर कर सकते हैं और श्री हरि विष्णु की 'अपार' कृपा के पात्र बन सकते हैं।
॥ जय श्री कृष्ण ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

