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आमलकी एकादशी

आमलकी एकादशी 2027:

सनातन धर्म की पावन परंपरा में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में शिरोमणि और मोक्ष प्रदाता माना गया है। प्रतिवर्ष आने वाली 24 एकादशियों में से फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी (जिसे आमला एकादशी, अक्षय एकादशी या रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है) अपना एक अत्यंत अनूठा, दिव्य और बहुआयामी महत्व रखती है। यह एकमात्र ऐसी एकादशी है जो प्रकृति (वनस्पति जगत), परमेश्वर (हरि-हर) और मानवीय स्वास्थ्य के त्रिवेणी संगम को प्रदर्शित करती है।

वर्ष 2027 में आमलकी एकादशी का यह महापर्व कालचक्र की एक अत्यंत दुर्लभ और अलौकिक ज्योतिषीय पृष्ठभूमि में आ रहा है। वर्ष 2027 के मकर संक्रांति उत्सव के बाद जब सूर्य देव उत्तरायण की ओर बढ़ते हुए मीन राशि में संचरण करेंगे, तब फाल्गुन शुक्ल एकादशी को ग्रहों और नक्षत्रों का एक ऐसा विन्यास बनेगा जो साधकों के लिए त्रिदोष नाशक और आध्यात्मिक चेतना को उन्नत करने वाला होगा।

वर्ष 2027 तिथि, काल गणना एवं शुभ मुहूर्त

वर्ष 2027 में आमलकी एकादशी का उपवास बृहस्पतिवार (गुरुवार) के दिन पड़ रहा है। देवगुरु बृहस्पति के दिन एकादशी का आना साक्षात हरि-कृपा का सूचक है। पंचांग की सूक्ष्म गणना के अनुसार इस वर्ष के सटीक मुहूर्त निम्नलिखित हैं:

  • आमलकी एकादशी मुख्य तिथि: बृहस्पतिवार, मार्च 18, 2027
  • एकादशी तिथि प्रारम्भ: मार्च 18, 2027 को 04:21 AM (सुबह) बजे से
  • एकादशी तिथि समाप्त: मार्च 19, 2027 को 01:51 AM (मध्यरात्रि के बाद) बजे तक
  • पारण (व्रत तोड़ने का) समय (19 मार्च): 07:12 AM से 08:52 AM तक
  • पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय: 07:12 AM

मुहूर्त विशेष निर्देश: शास्त्रों के अनुसार, हरि वासर (द्वादशी तिथि का प्रथम चौथाई भाग) के दौरान व्रत का पारण पूर्णतः वर्जित होता है। चूँकि 19 मार्च 2027 को हरि वासर सुबह 07:12 बजे समाप्त हो रहा है, इसलिए श्रद्धालु सुबह 07:12 AM से 08:52 AM के बीच ही अपना व्रत खोलें।

वर्ष 2027 का ज्योतिषीय व खगोलीय महासंयोग: ग्रह और नक्षत्र

वर्ष 2027 की आमलकी एकादशी खगोलीय दृष्टि से अत्यधिक शक्तिशाली ऊर्जा का केंद्र बन रही है। इस दिन बन रहे मुख्य ज्योतिषीय योग इस प्रकार हैं:

1. मकर संक्रांति चक्र और 'गुरुवार-एकादशी' का महासंयोग
वर्ष 2027 की शुरुआत में जनवरी में संपन्न हुए मकर संक्रांति पर्व के बाद से सूर्य देव उत्तरायण में हैं। मार्च के इस उत्तरार्ध में सूर्य नारायण देवगुरु बृहस्पति की राशि मीन में गोचर कर रहे होंगे। गुरुवार के दिन एकादशी का आना और सूर्य का गुरु की राशि में होना 'नारायण योग' के समान फल देता है, जो धन, ज्ञान और संतान सुख की वृद्धि के लिए अचूक है।

2. पुष्य और पुनर्वसु नक्षत्र का संचरण
18 मार्च 2027 को चंद्रमा देवगुरु बृहस्पति के पुनर्वसु और तदोपरांत शनि देव के पुष्य नक्षत्र के गोचर प्रभाव में रहेंगे। पुष्य नक्षत्र को सभी नक्षत्रों का राजा माना जाता है। इस नक्षत्र विन्यास में आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर की गई साधना सीधे तौर पर विष्णु-लक्ष्मी को जाग्रत करती है और आर्थिक दरिद्रता को समूल नष्ट कर देती है।

आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति का महा-पुराणिक रहस्य

शास्त्रों में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति की कथा अत्यंत विस्मयकारी और भावपूर्ण है। ब्रह्मांड की रचना के समय, जब संपूर्ण चराचर जगत जलमग्न था और भगवान नारायण क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान थे, तब उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। उस कमल से सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई।

ब्रह्मा जी को जब अपने अस्तित्व और ब्रह्मांड के निर्माण के कर्तव्य का बोध हुआ, तब वे उस परम सत्ता को जानने के लिए घोर तपस्या में लीन हो गए। उनकी यह तपस्या हजारों वर्षों तक चलती रही। एक दिन, उनकी अनन्य भक्ति और कठोर तप से प्रसन्न होकर साक्षात भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। भगवान के शंख, चक्र, गदा और पद्मधारी चतुर्भुज रूप को देखकर ब्रह्मा जी के नेत्रों में प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी।

ब्रह्मा जी के वे प्रेमाश्रु जब भगवान विष्णु के चरणों के पास पृथ्वी पर गिरे, तो उन दिव्य आंसुओं के स्पर्श से एक महान और सुंदर पौधा अंकुरित हुआ। उसे देखकर भगवान विष्णु ने कहा—"हे ब्रह्मा! आपके इन प्रेमाश्रुओं से उत्पन्न यह वृक्ष संसार में 'आमलकी' (आंवला) के नाम से जाना जाएगा। यह मेरा परम प्रिय वृक्ष होगा। इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल मिलेगा, स्पर्श से पुण्य बढ़ेगा और इसके फल का भक्षण करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।" इसी कारण इस वृक्ष को 'आदि-वृक्ष' भी कहा जाता है।

आमलकी एकादशी का बहुआयामी महत्व

1. धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन मान्यताओं के अनुसार, आंवले के वृक्ष के मूल (जड़) में भगवान विष्णु, उसके तने में भगवान शिव, शाखाओं में ऋषि-मुनि, पत्तों में वासुदेव और फलों में स्वयं साक्षात माता लक्ष्मी निवास करती हैं। इसलिए, इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने का अर्थ है संपूर्ण ब्रह्मांड के देवी-देवताओं की एक साथ आराधना करना। शास्त्रों का कथन है कि यदि कोई व्यक्ति जीवन भर कोई व्रत नहीं कर पाया हो, और वह पूर्ण निष्ठा से केवल एक बार आमलकी एकादशी का व्रत कर ले, तो उसे मोक्ष पद की प्राप्ति होती है।

2. वैज्ञानिक एवं स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण

आयुर्वेद में आंवले को 'अमृत फल' या 'धात्री' (माता के समान रक्षा करने वाली) कहा गया है। फाल्गुन का महीना ऋतु संधि का काल होता है, जहाँ शीत ऋतु विदा ले रही होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो रहा होता है। इस संधिकाल में मानव शरीर के भीतर वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे बीमारियाँ फैलने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

आंवला त्रिदोष नाशक है। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन-सी और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले तत्व होते हैं। इस दिन उपवास रखकर आंवले का सेवन करने से शरीर का शुद्धिकरण होता है। हमारे दूरदर्शी ऋषियों ने स्वास्थ्य रक्षा के इस विज्ञान को धर्म से जोड़ दिया ताकि आम जनमानस अनजाने में ही सही, लेकिन अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सके।

व्रत के कड़े नियम: क्या करें और क्या न करें?

अनुकरणीय कर्म (क्या अवश्य करें):

  • व्रत का नियम दशमी तिथि (17 मार्च) की रात्रि से ही शुरू हो जाता है। दशमी की रात को सात्विक और हल्का भोजन करना चाहिए ताकि एकादशी के दिन ध्यान लगाने में आसानी हो।
  • इस दिन साधक को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की पूजा करना इस दिन सर्वोत्तम माना गया है।
  • इस दिन यथासंभव कम बोलना चाहिए या मौन व्रत रखना चाहिए, ताकि ऊर्जा का ह्रास न हो।
  • जल, वस्त्र, पीले अनाज और विशेष रूप से आंवले के फलों का दान गरीबों को करना चाहिए।
  • एकादशी की रात को विलासिता का त्याग कर भूमि पर बिस्तर लगाकर सोना चाहिए, या फिर पूरी रात जागकर कीर्तन करना चाहिए।

वर्जित कर्म (क्या भूलकर भी न करें):

  • इस दिन पूरी तरह से अन्न और विशेषकर चावल का त्याग करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन चावल में रेंगने वाले जीव का वास माना जाता है और वैज्ञानिक रूप से चावल जल तत्व को सोखता है जिससे मन चंचल होता है।
  • घर में किसी भी प्रकार का कलह, द्वेष या क्रोध नहीं करना चाहिए।
  • तुलसी के पत्ते इस दिन नहीं तोड़ने चाहिए, क्योंकि माना जाता है कि तुलसी जी स्वयं भगवान विष्णु के लिए व्रत रखती हैं। इसके लिए 1 दिन पहले ही पत्ते तोड़कर रख लेने चाहिए।
  • पूरी तरह से सात्विकता का पालन करना चाहिए और तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन, मांस या मदिरा से कोसों दूर रहना चाहिए। दातून करते समय भी ध्यान रखें कि वृक्ष की टहनी न तोड़ें, गिरे हुए पत्तों का ही उपयोग करें।

संपूर्ण पूजन विधि

आमलकी एकादशी की पूजा को पूरी श्रद्धा और शास्त्रीय विधि से करने पर ही उसका पूर्ण फल मिलता है। यहाँ इसकी संपूर्ण चरणबद्ध विधि दी जा रही है:

[ब्रह्म मुहूर्त स्नान] ➔ [व्रत संकल्प] ➔ [वेदी व कलश स्थापना] ➔ [धूप-दीप व अर्घ्य] ➔ [भोग व कलावा परिक्रमा] ➔ [कथा व आरती]

प्रातः काल का अनुष्ठान और संकल्प: साधक को सूर्योदय से कम से कम 2 घंटे पहले उठना चाहिए। स्नान के पानी में थोड़ा सा गंगाजल और आंवले का रस मिलाकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद साफ-सुथरे पीले वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, पीले फूल और अक्षत लेकर संकल्प लें: "हे सर्वेश्वर! मैं 18 मार्च 2027 को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी का यह महाव्रत आपकी प्रसन्नता के लिए कर रहा/रही हूँ। मेरा यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो।"

आंवले के वृक्ष की देव-प्रतिष्ठा: यदि घर के पास आंवले का पेड़ है, तो वहां जाएं। यदि पेड़ नहीं है, तो गमले में लगा पौधा या फिर भगवान विष्णु की मूर्ति के पास एक बड़ा आंवले का फल रखकर उसे ही वृक्ष का प्रतीक मान लें। वृक्ष के चारों ओर की भूमि को गंगाजल से पवित्र करें। वहां एक सुंदर वेदी बनाएं और उस पर कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर पंचपल्लव रखें और उस पर लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

धूप-दीप और अर्घ्य: वृक्ष की जड़ में साफ जल या गंगाजल अर्पित करें। इसके बाद भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष को सुंगधित चंदन, हल्दी, कुमकुम और रोली का तिलक लगाएं। उन्हें पीले रंग के पुष्पों की माला पहनाएं। सुगंधित धूप और गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं।

भोग और परिक्रमा: भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष को मोदक, पेड़े या ऋतु फल के साथ-साथ आंवला विशेष रूप से अर्पित करें। ध्यान रहे कि हर भोग में तुलसी का पत्ता अवश्य होना चाहिए। इसके बाद सूती कलावा (मौली) लेकर आंवले के वृक्ष की परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का निरंतर जाप करते रहें। आप अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा कर सकते हैं। परिक्रमा पूरी होने के बाद वृक्ष की जड़ में कपूर जलाकर आरती करें।

कथा और आरती: वृक्ष के नीचे बैठकर ही आमलकी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। अंत में भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की आरती करें और उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें।

पौराणिक व्रत कथा

पद्म पुराण के अनुसार, राजा मान्धाता ने जब महर्षि वसिष्ठ से किसी ऐसे व्रत के बारे में पूछा जिससे अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिल सके, तब वसिष्ठ जी ने यह कथा सुनाई:

चित्रसेन का राज्य और एकादशी का नियम

प्राचीन काल में 'वैदिश' नाम का एक अत्यंत वैभवशाली और समृद्ध नगर था। उस नगर की विशेषता यह थी कि वहां के राजा से लेकर अत्यंत साधारण नागरिक तक, सभी लोग परम धार्मिक, सत्यवादी और ईश्वर भक्त थे। वहां के राजा का नाम 'चित्रसेन' था, जो चंद्रवंश के एक प्रतापी और न्यायप्रिय शासक थे।राजा चित्रसेन के राज्य में एकादशी व्रत का पालन करना अनिवार्य माना जाता था। एक बार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आया। राजा चित्रसेन सहित पूरी प्रजा ने इस व्रत को बड़े उत्सव के रूप में मनाने का निश्चय किया। सुबह से ही नगर के मुख्य मंदिर को सजाया गया, जहाँ एक विशाल आंवले का वृक्ष था। राजा और उनकी प्रजा ने वहां जाकर विधि-विधान से पूजा की, कलश स्थापित किया और भगवान विष्णु के भजनों में मग्न हो गए। जब रात हुई, तो सभी लोग घर जाने के बजाय वहीं मंदिर परिसर में ही बैठकर जागरण करने लगे।

शिकारी का आगमन और हृदय परिवर्तन

उसी रात एक भूखा-प्यासा और थका हुआ शिकारी भोजन की तलाश में भटकता हुआ उस मंदिर के पास आ पहुंचा। वह शिकारी स्वभाव से अत्यंत क्रूर था और वन्य जीवों की हत्या करके ही अपना जीवन यापन करता था। उसने जब मंदिर में इतनी भीड़ और प्रकाश देखा, तो वह किसी अनिष्ट की आशंका से डर गया और मंदिर के एक अंधेरे कोने में छिपकर बैठ गया।
लेकिन उस रात कोई नहीं सोया। शिकारी भूखा होने के कारण व्याकुल था, परंतु पकड़े जाने के डर से वह अपनी जगह से हिल भी नहीं सकता था। कोने में बैठे-बैठे ही उसने रात भर भगवान विष्णु के दिव्य भजनों को सुना, पंडित जी के मुख से आमलकी एकादशी के महत्व की पूरी कथा सुनी और अनजाने में ही सही, वह भी रात भर जागता रहा। इस प्रकार, भूखे रहने के कारण उसका उपवास हो गया और रात भर जागने के कारण उसका जागरण भी पूरा हो गया। सुबह होते ही जब राजा और प्रजा अपने-अपने घरों को चले गए, तो वह शिकारी भी अपने निवास पर लौट आया और कुछ समय बाद उसने भोजन किया। कुछ दिनों के बाद उस शिकारी की मृत्यु हो गई।

अगले जन्म का वैभव और डाकुओं से रक्षा

चूंकि उसने अनजाने में ही सही, लेकिन आमलकी एकादशी का पूर्ण व्रत और जागरण किया था, इसलिए उसके जीवन के सारे पाप नष्ट हो गए। अपने अगले जन्म में उस शिकारी ने एक महान और प्रतापी राजा के घर जन्म लिया। उसका नाम 'राजा वसुरथ' रखा गया। एक दिन राजा वसुरथ अपने सैनिकों के साथ घने जंगल में शिकार खेलने गए। शिकार का पीछा करते-करते वे अपने सैनिकों से बिछड़ गए और घने जंगल के बीच रास्ता भटक गए। दोपहर की तेज धूप और अत्यधिक थकान के कारण उनका शरीर शिथिल हो गया। वे एक बड़े वृक्ष की घनी छाया के नीचे अपनी तलवार सिरहाने रखकर सो गए। उसी जंगल में कुछ डाकुओं का गिरोह रहता था। उन्होंने जब राजा को अकेला और सोया हुआ पाया, तो उन पर हथियारों से हमला कर दिया।

परंतु जैसे ही डाकुओं ने राजा पर वार किया, एक अत्यंत विस्मयकारी घटना घटी। राजा के शरीर को छूते ही डाकुओं के सारे हथियार फूलों की पंखुड़ियों में बदल गए। तभी अचानक राजा वसुरथ के हृदय से एक अत्यंत दिव्य और देदीप्यमान देवी प्रकट हुईं। उनके हाथों में एक चमकता हुआ चक्र था। उन्होंने क्षण भर में ही उन सभी डाकुओं का संहार कर दिया जो राजा को मारने आए थे।जब कुछ समय बाद राजा वसुरथ की नींद खुली, तो उन्होंने अपने चारों ओर डाकुओं के शव पड़े देखे। राजा ने अचंभे से पूछा, "इस वन में मेरा कौन सा मित्र या रक्षक छिपा है?" तभी आकाश से एक गंभीर और मधुर आकाशवाणी हुई: "हे राजन! इस संसार में भगवान विष्णु के अतिरिक्त तुम्हारा रक्षक कौन हो सकता है? तुम पूर्व जन्म में जो भूखे शिकारी थे, तुमने अनजाने में फाल्गुन शुक्ल एकादशी का जो व्रत और रात्रि जागरण किया था, यह उसी महापुण्य का प्रभाव है।" राजा वसुरथ अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने राज्य लौटकर जीवनभर एकादशी का व्रत करते रहे।

आमलकी एकादशी के अन्य सांस्कृतिक आयाम

1. काशी (वाराणसी) में 'रंगभरी एकादशी' का महा-उत्सव
वाराणसी में इस दिन का उत्सव अद्भुत होता है। इसे रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर विवाह बंधन में बंधने के बाद, इसी दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती को विदा कराकर अपनी नगरी काशी लाए थे। इस खुशी में बाबा के भक्त उन पर और माता पार्वती पर जमकर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर में शिव-पार्वती की चल-प्रतिमा का भव्य शृंगार होत

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