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अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया (आखा तीज)  वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र हिंदू और जैन त्योहार है। 'अक्षय' का अर्थ है जिसका कभी क्षय (नाश) न हो, इसलिए इस दिन किए गए दान, तप और शुभ कार्यों का फल अनंत और स्थायी माना जाता है। यह अबुज मुहूर्त है,अर्थात बिना पंचांग देखे विवाह, गृह प्रवेश और नई खरीदारी के लिए यह दिन सर्वोत्तम है।

हिन्दू धर्म में महत्त्व

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र व गङ्गा स्नान करके और शान्त चित्त होकर, भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ व गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, पात्र, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है।ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ,भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसन्त ऋतु के अन्त और ग्रीष्म ऋतु का प्रारम्भ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, शक्कर, साग, इमली, सत्तू आदि घर्मी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है।इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग व अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा श्वेत कमल अथवा श्ववेत पाटल (गुलाब) व पीले पाटल से करनी चाहिये।

पौराणिक एवं प्रामाणिक व्रत कथा

प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव-ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से इस व्रत के माहात्म्य को सुना। कालांतर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया।विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू,पंखा,जल से भरे घड़े,जौ,गेहूं,नमक, सत्तू, दही, चावल,गुड़,सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएं ब्राह्मणों को दान की। स्त्री के बार-बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म-कर्म और दान-पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई। अक्षय तृतीया के दिन इस कथा के श्रवण से अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

अक्षय तृतीया से जुड़ी प्रमुख कथाएँ

1. कृष्ण और सुदामा की कथा

यह सबसे प्रसिद्ध कथा है। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे, जो अपने बचपन के मित्र भगवान कृष्ण से मिलने द्वारका गए। उनके पास देने के लिए केवल थोड़ा सा चिवड़ा (पोहे) था।भगवान कृष्ण ने सुदामा का बहुत प्रेम और सम्मान के साथ स्वागत किया। सुदामा अपनी गरीबी के बारे में कुछ कह नहीं पाए, लेकिन कृष्ण ने बिना कहे ही उनकी स्थिति समझ ली।ब सुदामा अपने घर लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनकी झोपड़ी महल में बदल चुकी है और उनका जीवन सुख-समृद्धि से भर गया है।यह कथा सिखाती है कि सच्ची मित्रता, भक्ति और विनम्रता का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता।

2. परशुराम का जन्म

मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म हुआ था। उन्होंने अधर्म और अन्याय को समाप्त करने के लिए अनेक युद्ध किए।यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म की रक्षा और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना जरूरी है।

3. महाभारत और अक्षय पात्र

महाभारत के अनुसार, जब पांडव वनवास में थे, तब उन्हें भोजन की बहुत कमी थी। एक दिन ऋषि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ भोजन के लिए आए।इस कठिन समय में द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से सहायता मांगी। तब कृष्ण ने उन्हें अक्षय पात्र दिया, जिससे कभी भोजन समाप्त नहीं होता था। यह कथा दर्शाती है कि सच्ची आस्था और विश्वास से हर संकट दूर हो सकता है।

4. महाभारत की रचना की शुरुआत

ऐसा माना जाता है कि इस दिन वेद व्यास ने महाभारत लिखना शुरू किया और गणेश ने उसे लिखा।इसलिए यह दिन ज्ञान और विद्या की शुरुआत के लिए भी शुभ माना जाता है।

5. इस दिन गंगा का धरती पर अवतरण हुआ माना जाता है।

6. इस समय के आसपास बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के कपाट खुलते हैं।

7. जैन धर्म में भी यह दिन महत्वपूर्ण है, क्योंकि भगवान ऋषभदेव ने इस दिन एक वर्ष के उपवास के बाद आहार ग्रहण किया था।

अक्षय तृतीया का महत्व  केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के कई गहरे पहलुओं से जुड़ा हुआ है। यह दिन हमें यह समझाता है कि वास्तविक समृद्धि केवल धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि हमारे विचारों, कर्मों और व्यवहार में होती है। “अक्षय” का सिद्धांत केवल भौतिक चीजों पर लागू नहीं होता,बल्कि यह हमारे अच्छे कर्मों, ज्ञान और संस्कारों पर भी लागू होता है, जो जीवनभर हमारे साथ रहते हैं और समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इस दृष्टि से अक्षय तृतीया एक ऐसा अवसर है,जब व्यक्ति अपने जीवन की दिशा को बेहतर बनाने का संकल्प ले सकता है और नए लक्ष्य निर्धारित कर सकता है।

 

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