अक्षय नवमी सनातन धर्म में एक बेहद पवित्र और फलदायी त्योहार माना जाता है। इसे आंवला नवमी के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार, इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, दान, या पुण्य कभी समाप्त नहीं होता, उसका फल 'अक्षय' (जिसका कभी क्षय न हो) हो जाता है।
अक्षय नवमी क्या है?
शास्त्रों के अनुसार, अक्षय नवमी का वही महत्व है जो वैशाख मास में अक्षय तृतीया का होता है। इस दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था, इसलिए इसे 'द्वापर युगादि तिथि' भी कहा जाता है।ऐसी मान्यता है कि इस दिन साक्षात भगवान विष्णु और शिव जी आंवले के वृक्ष में निवास करते हैं। 'अक्षय' शब्द का अर्थ है जिसका कभी नाश न हो। इस दिन किए गए जप, तप, दान और पूजा का पुण्य जन्म-जन्मांतर तक मनुष्य के साथ रहता है।
यह कब मनाई जाती है?
अक्षय नवमी प्रतिवर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। यह दीपावली के ठीक 9 दिन बाद और देवउठनी एकादशी से दो दिन पहले आती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह त्योहार आमतौर पर नवंबर के महीने में पड़ता है।
अक्षय नवमी का महत्व
- आरोग्य की प्राप्ति: आंवले के वृक्ष में औषधीय गुण होते हैं। इस दिन आंवले के नीचे बैठने और भोजन करने से शरीर के रोग दूर होते हैं।
- युगादि तिथि: इसी दिन से द्वापर युग की शुरुआत मानी जाती है।
- लक्ष्मी-विष्णु का वास: माना जाता है कि कार्तिक शुक्ल नवमी को माता लक्ष्मी ने पृथ्वी पर आकर आंवले के पेड़ की पूजा की थी और इसके नीचे बैठकर भोजन किया था।
पूजन विधि
अक्षय नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसकी मुख्य पूजन विधि इस प्रकार है:
1.दिशा और स्थान:सुबह पूर्व दिशा की ओर मुख करके आंवले के वृक्ष के पास जाएं।
2.वृक्ष की सफाई: पेड़ के आस-पास की जगह को साफ करें और वहां जल छिड़कें।
3.जल अर्पित करना: आंवले के वृक्ष की जड़ में पहले साफ जल और फिर दूध अर्पित करें।
4.पूजन सामग्री: पेड़ के तने पर रोली, चंदन, हल्दी, अक्षत (चावल) और फूल चढ़ाएं।
5.दीपदान: आंवले के पेड़ के नीचे एक घी का दीपक और धूप जलाएं।
6.परिक्रमा: पेड़ के चारों ओर सूत का धागा (कच्चा सूत) या मौली (कलवा) लपेटते हुए 8, 108 या 7 बार परिक्रमा करें।
7आरती और कथा: पूजा के बाद आंवला नवमी की कथा सुनें या पढ़ें और अंत में कपूर से आरती करें।
इस दिन क्या करना चाहिए?
- आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन: इस दिन का सबसे मुख्य नियम है कि परिवार के सभी सदस्यों को आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बनाना और खाना चाहिए। यदि पेड़ न मिले, तो घर में आंवले की शाखा लाकर भी यह परंपरा निभाई जा सकती है।
- दान का महत्व: इस दिन ब्राह्मणों, गरीबों और जरूरतमंदों को ऊनी कपड़े, अनाज, पैसा और आंवले का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- सोने-चांदी की खरीदारी: अक्षय तृतीया की तरह इस दिन भी सोना, चांदी या नए बर्तन खरीदना भाग्यशाली माना जाता है।
- आंवले का सेवन: इस दिन प्रसाद के रूप में आंवला खाना सेहत और सौभाग्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।
अक्षय नवमी से जुड़ी पौराणिक कथाएं
अक्षय नवमी को लेकर मुख्य रूप से दो कथाएं सबसे ज्यादा प्रचलित हैं:
कथा 1: सेठ और सेठानी की कहानी (दान का फल)
प्राचीन काल में एक नगर में एक वैश्य (सेठ) रहता था, जो बहुत ही धर्मात्मा और दानी था। वह हर साल आंवला नवमी के दिन ब्राह्मणों को आंवले के पेड़ के नीचे बैठाकर भोजन कराता था और उन्हें सोने-चांदी के सिक्के, कपड़े और दान-दक्षिणा देता थायह देखकर उसकी पत्नी (सेठानी) को बहुत ईर्ष्या होती थी। वह सोचती थी कि इस तरह तो सारा धन खत्म हो जाएगा। उसने अपने बेटों से कहकर सेठ को दान करने से रुकवा दिया और घर से दूर दूसरे गांव में रहने के लिए मजबूर कर दिया।सेठ ने दूसरे गांव जाकर एक उजाड़ दुकान ली, लेकिन उसने अपनी आस्था नहीं छोड़ी। उसने वहां भी एक आंवले का पौधा लगाया और उसकी सेवा करने लगा। भगवान विष्णु की कृपा से उसकी दुकान खूब चलने लगी और वह पहले से भी ज्यादा अमीर हो गया। दूसरी ओर, उसके बेटों और पत्नी का सारा धन नष्ट हो गया और वे दाने-दाने को मोहताज हो गए।एक दिन अपनी गलती का अहसास होने पर पत्नी और बेटे सेठ के पास पहुंचे और क्षमा मांगी। सेठ ने उन्हें माफ कर दिया और फिर से पूरे परिवार ने मिलकर आंवला नवमी का व्रत और दान शुरू किया।
सीख: इस कथा से स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से अक्षय नवमी पर दान करता है, उसके घर में कभी दरिद्रता नहीं आती।
कथा 2: माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु-शिव की कथा
एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आईं। उनके मन में भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की एक साथ पूजा करने की इच्छा हुई। उन्होंने विचार किया कि विष्णु जी को 'तुलसी' प्रिय है और शिव जी को 'बिल्वपत्र'।तभी उन्हें याद आया कि आंवले के वृक्ष में तुलसी और बिल्व दोनों के गुण पाए जाते हैं, क्योंकि इसमें साक्षात विष्णु और शिव का वास होता है। माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ को ही दोनों का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी जी ने आंवले के पेड़ के नीचे भोजन बनाकर दोनों देवों को जिमाया और स्वयं भी भोजन किया। तभी से इस दिन आंवले के नीचे भोजन बनाने और खाने की परंपरा चली आ रही है।
अक्षय नवमी के अन्य विभिन्न पक्ष
- कनकधारा स्तोत्र का पाठ
चूंकि यह दिन माता लक्ष्मी को भी अत्यंत प्रिय है, इसलिए कई लोग इस दिन घर में सुख-समृद्धि और धन की कमी को दूर करने के लिए कनकधारा स्तोत्र या लक्ष्मी सूक्त का पाठ करते हैं।- पर्यावरण और स्वास्थ्य का संदेश
सनातन धर्म के वैज्ञानिक पक्ष को देखें, तो अक्षय नवमी का त्योहार हमें प्रकृति से जोड़ता है। नवंबर के महीने में ठंड की शुरुआत होती है, और इस मौसम में आंवला (Vitamins और Antioxidants से भरपूर) खाना इम्युनिटी बढ़ाता है। हमारे पूर्वजों ने धार्मिक महत्व जोड़कर पेड़ों की रक्षा और उनके औषधीय लाभों को सीधे मानव जीवन से जोड़ दिया।- मथुरा-वृंदावन में 'परिक्रमा' का महत्व
ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृंदावन और गोवर्धन) में अक्षय नवमी का बहुत बड़ा उत्सव होता है। इस दिन लाखों श्रद्धालु मथुरा-वृंदावन की सांझी परिक्रमा (जुगल जोड़ी परिक्रमा) शुरू करते हैं। माना जाता है कि इस दिन ब्रज मंडल की यात्रा करने से अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है और भगवान कृष्ण की विशेष कृपा मिलती है।
निष्कर्ष
अक्षय नवमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करने, परिवार के साथ मिलकर आनंद मनाने (आंवले के नीचे भोजन करने) और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने (दान-पुण्य) का एक सुंदर पर्व है। श्रद्धापूर्वक किया गया इस दिन का व्रत और पूजन जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य लेकर आता है।

