होली पूजन
होली हिंदू धर्म का एक प्रमुख और रंगों से भरा हुआ त्योहार है, जिसे विशेष रूप से प्रेम, भाईचारे, और उल्लास के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली के दिन लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं। होली के साथ-साथ होली पूजा भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती है, जो विशेष रूप से होली के एक दिन पहले होलिका दहन के रूप में बनाया जाता है।
Puja starts from ₹501.00
Puja Duration: 1 hour
Culture/Rituals: Hindi
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होली हिंदू धर्म का एक प्रमुख और रंगों से भरा हुआ त्योहार है, जिसे विशेष रूप से प्रेम, भाईचारे, और उल्लास के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली के दिन लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं। मान्यताओं के अनुसार होली का त्यौहार मनाने के एक दिन पहले अग्नि की पूजन का विशेष महत्व माना जाता है. माना जाता है कि अग्नि देव की पूजा करने से मिलने वाले आशीर्वाद से अच्छी सेहत और लंबी आयु का वरदान मिलता है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के अन्य रूपों में से एक रूप अग्निदेव का है। होलिका दहन में जो भी सामग्री डाली जाती है ,वो अग्निदेव ही देवताओं को पहुंचाते हैं। इसका जिक्र प्राचीन वेद पुराणों में किया गया है। अग्नि की प्रार्थना, उपासना से साधक धन, धान्य, और समृद्धि प्राप्त करता है।
पूजन विधि
शुभ मुहूर्त में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ जाएं। होलिका पूजा के लिए पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करना चाहिए। सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें. उसके बाद मंत्र का जाप करते हुए होलिका की पूजा करें। उसके बाद मंत्र का उच्चारण करते हुए प्रहलाद और भगवान नरसिंह की विधि विधान से पूजा-अर्चना कर लें। अब आप होलिका की परिक्रमा कम से कम सात बार करते हुए उसमें कच्चा सूत लपेट दें, पूजा सामग्री अर्पित कर दें। उसके बाद कपूर या दीपक से आग जलाकर होलिका दहन करें। इस दौरान सिर को किसी कपड़े से ढककर रखें। जौ, अनाज आदि आग में अर्पित कर दें।
नोट: होली पूजा को एक आनंदित और शुभ दिन के रूप में मनाएं, परंतु सुरक्षित और सतर्कता से रंग खेलें और पर्यावरण का ध्यान रखें।
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Additional Information
होली कथा
होलिका दहन जहां एक ओर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, वहीं भक्त का भगवान पर अटूट विश्वास की भी प्रतीक है। यह दहन भक्त प्रहलाद पर उसके पिता हिरण्यकश्यप और उसकी बुआ होलिका के द्वारा की गई प्रताड़नाओं की याद भी दिलाता है। होलिका हिरण्यकश्यप के कहने पर भक्त प्रहलाद को जलाकर मारना चाहती थी, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद बच गए और होलिका जलकर मर गई।
हिरण्यकश्यप राक्षस राजा था। उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात हिरण्यकश्यप को पसंद नहीं थी और उसने प्रहलाद को कई बार समझाने के बाद मारने तक का प्रयास किया। जब हिरण्यकश्यप कई तरीको से अपने पुत्र भक्त प्रहलाद को न मार पाया तब जाकर प्रहलाद की बुआ होलिका को उसे मारने का आदेश दिया। अपने भाई के आदेश पर प्रहलाद को मारने के लिए होलिका आग में प्रहलाद को लेकर बैठ गयी थी। होलिका राक्षसी को ब्रह्मदेव से वरदान प्राप्त था की अग्नि उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी अर्थात वह अग्नि में नहीं जलेगी। होलिका तो जलकर मर गई ,लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद बच गए

